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Monday, 29 July 2013

संसद.. Parliament..

संसद..Parliament..

 एक नजर हमारे पूरे संसद और उसकी सभी कार्यप्रणाली पर !

 

Part 1 -  Part 2Part 3 - Part 4 -

 


संसद,केन्द्र सरकार का विधाय अंग हे. संसदीय प्रणाली,जिसे सरकार का वेस्टमिस्तर माडल भी कहते हे,अपनाने के कारण भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था मे संसद एक विशिष्ट व केन्द्रीय स्थान रखती है .
संविधान के पाचवे भाग के अंतर्गत अनुच्छेद ७९ से १२२ मे संसद के गठन ,संरचना,अधिकारियो,प्रक्रिया,विशेषाधिकार,व श्क्ति आदि के बारे मे वर्णन किया गया है. 

संसद का गठन-

               संविधान के अनुसार भारत की संसद के तीन अंग है- राष्ट्रपति,लोकसभा व राज्यसभा . १९५४ मे राज्य परिषद एव जनता का सदन के स्थान पर क्रमश; राज्यसभा एव लोकसभा शब्द अपनाया गया। राज्यसभा ,उच्च सदम कहलाता है जबकि लोकसभा निचला सदन कहलाता है। राज्यसभा मे राज्य व संघ राज्य शेट्रो के प्रतिनिधि होते है, जबकि लोकसभा सम्पूर्ण रूप मे भारत के लोगो का प्रतिनिधितव करती है।

हालाकी राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है और न ही वह संसद मे बैठता है। लेकिन राष्ट्रपति ,संसद का अभिन्न अंग है। एसा इसलिये है क्योकी संसद के दोनो सदनो द्वारा पारित कोई विधेयक तब तक विधि नहीं बंटा ,जब तक राष्ट्रपति उसे अपनी अधिकृति न देता। राष्ट्रपति,संसद के कुछ चुनिंदा कार्य भी करता है।उदाहरण स्वरूप -राष्ट्रपति दोनो सदनो का सत्र आहूत करता है। याफिर सत्रावसान करता है। वह लोकसभा को विघटित कर सकता है। जब संसद का सत्र न चल रहा हो, वह अध्यादेश जारी कर सकता है आदि।

इस मामले मे भारतीय संविधान ,अमेरिका के स्थान पर ब्रिटेन की पद्धति पर आधारित है। ब्रिटेन की संसद ताज (राजा या रानी) ,हॉउस ऑफ लॉर्ड व हॉउस ऑफ कॉमन्स से मिलकर बनती है। इसके विपरीत,अमेरिका राष्ट्रपति विधानमंडल का महतवपूर्ण अंग नहीं है। अमेरिका विधानमंडल के कॉंग्रेस के नाम से जाना जाता है। कॉंग्रेस के अंतर्गत सीनेट ,हॉउस ऑफ रीप्रेसेन्टिव होते है।
सरकार की संसदीय पद्धति मे विधाय व कार्यकारी अंगो मे परस्पर निर्भरता पर जोर दिया जाता है। अंत; हमारे संसद मे राष्ट्रपति ,ब्रिटेन की संसद मे ताज की तरह है। वह दूसरी तरह, राष्ट्रपति पद्धति वाली सरकार मे विधाय और कार्यकारी अंगो को अलग करने पर जोर दिया जाता है। इसीलिये अमेरिका राष्ट्रपति,कॉंग्रेस का घटक नहीं माना जाता है।

दोनो सदनो की संरचना-  


राजसभा की संरचना:
                    राज्यसभा की अधिकतम सांख्या २०५ निर्धारित है। इनमे मे २३८ सदस्य राज्यो व संघ राज्यो शेत्र के प्रतिनिधि (अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित) होंगे, जबकि १२ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोमित किये जायेंगे।
वर्तमान मे राज्यसभा मे २४५ सदस्य है।इनमे २२९ सदस्य राज्यो का प्रतिनिधितव करते है,४ संघ राज्य शेत्र का प्रतिनिधितव करते है और १२ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोमित है।
संविधान की चौथी अनुसूची मे राज्यसभा के लिये राज्यो व संघ ष्ट्र मे सीटो के आवंटन का वर्णन किया है।
१) राज्यो का प्रतिनिधितव:
                      राज्यसभा मे राज्यो के प्रतिनिधि का निर्वाचन राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य करते है। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधितव पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। राज्यसभा के लिये राज्यो की सीटो का बंटवारा उनकी जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। इसलिये राज्यो के प्रतिनिधीयो की सांख्या अलग-अलग राज्यो मे अलग होती है। उदाहरण स्वरूप- उत्तर प्रदेश से ३१ सदस्य है जबकि त्रिपुरा से १ सदस्य है। अमेरिका मे "सीनेट" मे राज्यो का प्रतिनिधितव बराबर होता है (जनसंख्या के आधार पर नहीं). हालांकि अमेरिका मे,जनसंख्या के स्थान पर सभी राज्यो को सीनेट मे समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। अमेरिकी सीनेट मे कुल १०० सीटे है तथा प्रटेक राज्य को २ सीटे प्राप्त है।

२) संघ राज्य शेत्र का प्रतिनिधित्व:
                             राज्यसभा मे संघ राज्यशेत्र का प्रटेक प्रतिनिधि इस कार्य के लिये निर्मित एक निर्वाचक मंडल स्वारा चुना जाता है। यह चुनाव भी  आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। ७ संघ राज्य शेत्र मे से सिर्फ २ (दिल्ली व पद्डुचेरी) के प्रतिनिधि राज्यसभा मे है। अन्य पांच संघ शासित प्रदेशो की जनसख्या तुलनात्मक रूप से काफी काम होने के कारण राज्यसभा मे उन्हे अलग प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।

३) नामित या नाम निर्देशित सदस्य:
                              राष्ट्रपति,राज्यसभा मे १२ एसे सद्स्यो को नामित या नाम निर्देशित करता है। जिन्हे कला ,साहित्य,विज्ञान और समाजसेवा ,विषयो के सम्बंध मे विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव हो। एसे व्यक्तियो को नामांकित करने के पीछे उद्देश् है की, नामी या प्रसिध व्यक्ति बिना चुनाव के राज्यसभा मे जा सके। यहा यह ध्यान देने वाली बात है की अमेरिकी सीनेट मे कोई नामित सदस्य नहीं होता है।

लोकसभा की संरचना:
                     लोकसभा की अधिकतम सांख्या ५५२ निर्धारित की गयी है। इनमे से ५३० राज्यो के प्रतिनिधि ,२० संघ राज्य शेत्र के प्रतिनिधि होते है। एगलो-इंडियन समुदाय के दो सद्स्यो को राष्ट्रपति नामित या नाम निर्देशित करता है।
                    वर्तमान मे लोकसभा मे ५४५ सदस्य है। इनमे से ५३० सदस्य राज्यो से, १३ सदस्य संघ राज्य शेत्र से और दो सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित या नाम निर्देशित एंग्लो-इंडियन से है।

१) राज्यो का प्रतिनिधित्व:            
                    लोकसभा मे राज्यो के प्रतिनिधि राज्यो के विभिन्न निर्वाचन ष्ट्र के लोगो द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते है। भारत के हर नागरिक को जिसकी उम्र १८ वर्ष से अधिक है और जिसे संविधान या विधि के उपबंधो के मुताबिक अयोग्य नहीं ठहराया गया हो, मत देने का अधिकार है। ६१वे संविधान संशोधन अधिनियम , १९८८ द्वारा मत देने की आयु सीमा को २१ वर्ष से घटकर १८ वर्ष कर दिया।

२) संघ राज्यशेत्र का प्रतिनिधित्व:
                            संविधान से संसद के संघ राज्यष्त्र के प्रतिनिधीयो को चुनने की विधि के निर्धारण का अधिकार दिया है। इसी के तहत संसद ने संघ राज्य शेत्र अधिनियम १९६५ बनाया, जिसके तहत संघ राज्य शेत्र से प्रत्यक्ष निर्वाचन के तहत लोकसभा के सदस्य चुने जाते है।

३) नामित या नाम निर्देशित सदस्य:
                              अगर एंग्लो-इंडियन समुदाय का लोकसभा मे पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो, तो राष्ट्रपति इस समुदाय के दो लोगो को नामित या उनका नाम निर्देशित कर सकता है। शुरुवात मे या उपबंध १९६० तक के लिये थी लेकिन ७९वे संविधान संशोधन अधिनियम १९९९ मे इस उपबंध को २०१० तक के लिये बढ़ा दिया गया।
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Sunday, 28 July 2013

प्रशासना बद्दल महत्वाचे..

प्रशासना बद्दल महत्वाचे..

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 डिस्क्लेमर: लोकप्रशासनावरील हा ऑथेंटिक वगैरे लेख नाही. प्रशासनाशी सहसा संबंध न येणाऱ्या मित्रांना ढोबळ कल्पना यावी एवढाच हेतू आहे. कुणी भर टाकल्यास स्वागत आणि आनंद आहे. काही चूक आढळल्यास अवश्य सांगावे.

जिल्हा प्रशासनामध्ये दोन प्रमुख उतरंडी असतात. राज्या राज्यांनुसार थोडे फरक असतात. प्रस्तुत संदर्भामध्ये –

विकास (डेव्हलपमेंट) उतरंड / हाएरार्की–

कलेक्टर – पीडी(डीआरडीए)/ अध्यक्ष जि.प. – बीडीओ/ सभापती पंचायत समिती – पीइओ/ सरपंच

पीडी(डीआरडीए) – प्रोजेक्ट डायरेक्टर (डिस्ट्रिक्ट रुरल डेव्हलपमेंट एजन्सी) (महाराष्ट्रात सीइओ असतात, पीडी पेक्षा रॅंक आणि जबाबदारीने वरचे पद); बीडीओ – ब्लॉक डेव्हलपमेंट ऑफिसर; पीइओ - पंचायत एक्स्टेन्शन ऑफिसर (महाराष्ट्रात ग्रामसेवक असतात.).

महसूल (रेव्हेन्यू) उतरंड –

कलेक्टर (जिल्हाधिकारी/ जिल्लापाळ) – सबकलेक्टर (उपजिल्हाधिकारी/ उपजिल्लापाळ - प्रांत) – तहसीलदार – रेव्हेन्यू इन्स्पेक्टर.

(रेव्हेन्यू इन्स्पेक्टर हा साधारणपणे पन्नास साठ गावे पाहतो. जमीनीचे सर्व कागद याच्या ताब्यात असतात. सरकारची शेवटची कडी. पृथ्वीवरचा सर्वात महत्त्वाचा माणूस! आपल्याकडे जसा तलाठी!)

याशिवाय कायदा सुव्यवस्था राखण्याची जबाबदारी या महसूल यंत्रणेतील अधिकाऱ्यांकडे असते. ते एक्झिक्युटिव्ह मॅजिस्ट्रेट असतात. म्हणजे कलेक्टर असतो डिस्ट्रिक्ट मॅजिस्ट्रेट (डीएम), सबकलेक्टर – सब डिव्हिजनल मॅजिस्ट्रेट (एसडीएम), तहसीलदार – एक्झिक्युटिव्ह मॅजिस्ट्रेट. ही मंडळी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, तसेच पोलीस ऍक्ट अंतर्गत काही अधिकार बाळगून असतात. कायदा सुव्यवस्थेसाठी हे जबाबदार असतात, आणि पोलीसांच्या साहाय्याने त्यांनी हे काम करायचे असते. गुन्हे तपासामध्ये यांचा काही संबंध नसतो. ते पोलीसांचे काम. म्हणजे पोलीसांना दुहेरी काम असते – कायदा-सुव्यवस्था, आणि गुन्हे अन्वेषण. [हे ग्रामीण भागात. शहरी भागात पोलीस कमिशनरेट असेल, तर असे अधिकार पोलीसांकडेच असतात. म्हणून त्यांना कमिशनर असे पद असते. म्हणजे आयुक्त – आयोगाचे अधिकारी, अर्धन्यायिक काम. पोलीस त्यामुळे कायदा सुव्यवस्था संपूर्णपणे सांभाळतात. तसेच वेगवेगळ्या किरकोळ परवानग्या/ लायसेन्स – मोर्चा/ लाउडस्पीकर/ इ. तेच देतात.]

तसेच, डिझॅस्टर मॅनेजमेंट ही संपूर्णपणे रेव्हेन्यू अधिकाऱ्यांची जबाबदारी असते. इमर्जन्सी ड्यूटी यांच्याकडे असते. उदा. पूर, दुष्काळ, उष्माघात, अपघात, इ.

निवडणुकांचे काम रेव्हेन्य़ू अधिकाऱ्यांनाच करावे लागते.

जनगणना यांच्याकरवीच.

व्यक्तीच्या ओळखीशी संबंधित रहिवासी प्रमाणपत्र, जातीचे दाखले, उत्पन्नाचे दाखले, पासपोर्टसाठी प्रमाणपत्र इ. दाखले देण्याचे अधिकार यांच्याकडे असतात. कदाचित माणसाची ओळख जमिनीशी निगडित असते, आणि जमिनीचे काम बघणारे लोक म्हणून असेल. (काही राज्यांत हे अधिकार लोकनियुक्त प्रतिनिधींना दिलेले आहेत, पण अशी प्रमाणपत्रे सगळीकडे ग्राह्य धरली जात नाहीत, फॉर ऑबव्हियस रीझन्स, आणि मुळातच ते त्यांचे काम नव्हेच.)

ही ठळक कामे. याशिवाय बरीच कामे असतात.

इतर विभाग – लाइन डिपार्टमेंट्स

यांना जिल्हे नसतात. म्हणजे यांचे जिल्हे थोडे वेगळे असतात असे म्हणणे जास्त योग्य ठरेल. म्हणजे असं – प्रत्येक खात्यासाठी एकेक मंत्री असतात. ते राज्यातले त्या त्या खात्याचे टॉप एक्झिक्युटिव्ह. हे टू इन वन असतात – एक्झिक्युटिव्ह पण आणि लेजिस्लेटर पण. जसे रेव्हेन्यू अधिकारी टू इन वन असतात – एक्झिक्युटिव्ह पण आणि (क्वासी) ज्युडिशियल पण.

मंत्री – सेक्रेटरी – डायरेक्टर – जिल्हा स्तरावरील अधिकारी.

उदा. शिक्षण मंत्री – शिक्षण सचिव – शिक्षण संचालक – जिल्हा शिक्षण अधिकारी – शिक्षण निरीक्षक.

हे ढोबळ उदाहरण झाले. प्रत्यक्षात थोडी अधिक गुंतागुंत असते. म्हणजे, वरील उदाहरणात बीडीओ, जिल्हा परिषद, कलेक्टर यांचेही अधिकार मिसळलेले असतात. शिवाय, सचिवालयाची वेगळी उतरंड असते, निर्देशालयाची (डायरेक्टोरेट/ डिरेक्टोरेट) वेगळी उतरंड.

सेक्रेटरी – सचिव हे खरे नोकरशहा. ब्युरोक्रॅट्स. मंत्र्यांचे सल्लागार. हे एक्झिक्युटिव्ह यंत्रणेचे सगळ्यात वरचे अधिकारी. डायरेक्टर म्हणजे फिल्डवरचे लोक आणि ब्युरोक्रॅट्सना जोडणारी कडी. यांच्या कामात सचिव आणि जिल्हा स्तरावरचे अधिकारी यांच्या प्रोफाइलचा संगम असतो. जिल्हा स्तरावरचे अधिकारी म्हणजे फिल्डवरचे लोक.

फिल्डवरचे सगळे अधिकारी जरी आपापल्या उतरंडीमध्ये काम करत असले, तरीही जिल्हा प्रशासनाला टाळून त्यांना काम करता येत नाही. त्यामुळे जिल्हा प्रशासन प्रमुख अर्थात कलेक्टर हा एकप्रकारे त्यांचा (म्हणजे सगळ्या जिल्ह्याचाच) सुपरवायजरी अधिकारी असतो.

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विशेष टिप्पणी!

आमदार/ खासदार/ लोकनियुक्त प्रतिनिधी यात नेमके कुठे येतात हे सूज्ञांना वेगळे सांगायला नकोच.

माझ्या मते ते ‘नेमके’ कुठेच नसतात, दुधात मिसळलेल्या साखरेसारखे/ मिठाच्या खड्याप्रमाणे सर्वव्यापी असतात! त्यांच्या चवीनुसार व्यवस्था नीट काम करते किंवा फेफरे आल्यासारखी वागून आपली वाट लावते.

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निजामाच्या तावडीतून सुटून आम्ही, म्हणजे आम्ही सध्याचे आठ जिल्हे


निजामाच्या तावडीतून सुटून आम्ही, म्हणजे आम्ही सध्याचे आठ जिल्हे 

 


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निजामाच्या तावडीतून सुटून आम्ही, म्हणजे आम्ही सध्याचे आठ जिल्हे औरंगाबाद, जालना, बीड, परभणी, उस्मानाबाद, लातूर, नांदेड आणि हिंगोली भारत नावाच्या देशात ज्याचा की आपल्या सगळ्यांनाच अतिशय अभिमान आहे, मराठवाडा म्हणून सामील झालो. एक प्रकारे मुक्त झालो. निझाम गेले पळून. पटेलांना मानावे लागेल. पण निझाम जातांना निझामशाही मात्र तशीच सोडून गेले. पण त्यात पटेलांचा काही दोष नाही.

निझामशाहीचे संस्कार आमचे इतके घट्ट की अगदी अलीकडे पर्यंत आमच्याकडे राजकारणी सरंजामशाही वगैरे काही गेलेली नाही अशा अविर्भावात राहायचे. धर्मसत्ता आमच्याकडे मागपर्यंत इतकी सशक्त होती की भल्या भल्या दलितांना आम्ही छोट्या मोठ्या मंदिरात ही प्रवेश नाकारलाय. नामांतराला विरोध आम्ही जितका केला तितका कदाचित दुसरीकडे होणे अशक्य होते. पुण्यात झाला असता पण नुसताच शाब्दिक; आमच्याकडे धर्म आणि जातीवर जीव ओवाळून टाकण्याची फार महान परंपरा आहे. स्त्रीचा आदर कसा नाही करायचा हे आम्हाला विचारा. आणि ते करण्याची पाळीच येऊ नये म्हणून काय करायचे ते ही आमच्या इतके कुणालाच माहित नाही. कमीत कमी लेखी तरी. पण आमचा असा संशय आहे की हरयाणा आणि पंजाब मध्ये आम्हाला या क्षेत्रात मागे टाकण्याची ताकत आहे. ही फार मोठी खंत.

आमच्याकडे पाणी वगैरे हा देवानेच बघायचा कारभार असल्याने आम्ही 'दादां' ना देव मानून अनेक गोष्टी त्यांच्यावर सोडल्यात. बाकी कधी कधी पाऊस पडतो; पण तो कदाचित इथे होवून गेलेल्या संतांच्या वशिल्याने पडत असावा असे वाटते. इथे अनेक संत होवून गेले. नावे आठवत  नाहीत. कदाचित एकनाथ, नामदेव, हम्म, हम्म, ज्ञानेश्वर, तुकाराम आणि आम्हाला असे दाट वाटते की संत कबीर सुद्धा. पण असे ही कुणाच्या काहीच लक्षात नसल्याने उगाच सांगून ही जास्त अर्थ नाही. पण इकडे संत जन्माला जरी आले असले तरी अनेकांनी हा भाग सोडून जाण्याचाच निर्णय घेतला. अनेकांच्या प्रबोधनालाही अशी माती दाखवाणारा आमचा हा भाग. इथून ज्ञानेश्वर शिकून निघून गेले, रामदास स्वामी निघून गेले आणि साई बाबाही. इतकेच काय तर शिवाजी महाराजही मूळचे इथचेच. तर असा हा आमचा संतांना आणि महान लोकांना जन्माला घालणारा प्रदेश. कदाचित पृथ्वी अस्तित्वात असल्यापासून येथे आहे आणि तरीही अजूनही आहे तेथेच आहे. वेरूळ-अजंठा वगैरे सोडले तर जग प्रसिद्ध म्हणवे असे मानव निर्मित आमच्याकडे काही नाही; किल्लारीचा भूकंप नैसर्गिक होता! आणि असेल तर कमीत कमी आतल्या नवीन पिढीला आणि बाहेरच्या कुणालाही माहित तरी नाही. असो.

अनेक बाहेरच्या लोकांना, म्हणजे महाराष्ट्र बाहेरच्या लोकांना आणि अनेक कोकणातल्या लोकांनाही शरद पवार मराठवाड्यातले वाटतत. ही एक क्षणिक आनंदाची गोष्ट. पण ते खरच नाहीत ही अतिशय दुर्दैवाची बाब. मग बाकी आमच्याकडे नावे सांगण्या सारखे कुणी नाही. गोपीनाथ मुंडेना बाहेर लोक ओळखतात, पण नागपूर इतके मोठे आहे की परळी दिसतच नाही, अगदी त्यांच्या धरमपेठेतही मावेल इतकिच. बाकी धर्माच्या बाबतीत परळीत रुद्र आहेत, म्हणजे जोतिर्लिंग हो. पण रुद्राच्या इतके जवळ असूनही परळीला नागपूरचा जास्त राग येत नाही किंवा पर्यायाने करता येत नाही. शेवटी रुद्र ही विष्णूंच्या मानाने... असू द्या. पण मुंडे साहेब आहेत हा तितकाच मराठवाड्याला, देश्मुखांनंतर, काडीचा आधार (काडीचा = काडीचा; बुडत्याला = मराठवाड्याला,  so मराठवाड्या = बुडत्या, finally बुडता = मराठवाडा!). कारण मराठवाड्यात नेतृत्व असले तरी त्याला फक्त लोकांचा आधार आहे, त्याचा लोकांना नाही! म्हणजे इथे निर्विवाद सत्ता आहे अनेकांची अगदी वडिलोपार्जित. पण  पाणी प्रश्न? दादा ठरवतील. उद्योग? अबब, आपल्याला काय करायचे ते पुण्या-मुंबईचे फ्याड! असे आहे सगळे. पण अगदीच चटणी भाकरी वर समाधान मानणारा सामान्य वर्ग इथे असल्याने अतिशय संत वृत्तीचे लोक इथे पाहायला मिळतात आणि म्हणूनच “ठेविले अनंते तैसेची राहावे, चित्ती असू द्यावे समाधान” असे इथले राजकारणीही लोकांना सतत आठवण करून देतात. असो.

पण आम्ही आठही जिल्हे आम्हाला मुक्त करण्यासाठी लढलेल्या समस्त मराठवाडा/हैद्राबाद मुक्ती संग्रामातील प्रत्येकाला वंदन करून, विनंती करतो की “हे महान पुरुष हो आणि स्त्रियांनो, इथल्या खचलेल्यांना बळ द्या आणि असंख्य राजा बळींना जन्म देणाऱ्या आयांना कळ द्या”.

मराठवाडा/हैदराबाद मुक्ती संग्रामातील सर्व स्वातंत्र्य सैनिकांना स्मरून आणि इथल्या शांतचित्त जनतेच्या शांततेवर आश्चर्य व्यक्त करून सर्व मराठवाड्याच्या जनतेला आणि या मुक्तीने आनंदित झालेल्या इतर प्रत्येकाला मराठवाडा मुक्ती दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा!           
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राष्ट्राच्या भविष्याचा वेध - माजलेले नेतृत्व, घाबरट आणि स्वार्थी नागरिक - पुढे काय?

राष्ट्राच्या भविष्याचा वेध - माजलेले नेतृत्व, घाबरट आणि स्वार्थी नागरिक - पुढे काय?

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या राष्ट्रातच काय पण कुठे ही या पूर्वी जगण्याचा फार असा आमचा अनुभव नाही. विचारलच तर अभ्यास ही फार नाही. पण तरीही जितक कळलंय त्यावरून अगदीच भितीदायक अशा भविष्याकडे वाटचाल होतीये असे वाटते. अनेकदा 'आशा' लागते हे सगळे सुधारेल म्हणून. पण बऱ्याच वेळेस नुसता भ्रमनिरस होतो.

मानवाच्या सुसंकृत होण्याकडचा प्रवासच वेगळ्या वाटेला लागलाय अस वाटायला लागत. कदाचित देव ही संकल्पना याच प्रवासात माणसाला आधार म्हणून सोबत करण्यासाठी पूर्वजांनी शोधली असावी. आणि आपण बावळटांनी सगळा प्रवासच तिच्या नावे  लिहून आजचा दिवस कसा 'मजेत' जाईल यावर फक्त लक्ष केंद्रित केलेय.
अगदी गेल्या ५ वर्षातल्याच भारतात घडलेल्या घटना नीट बघितल्यास आपला प्रवास अंधाकाराकडे आहे हे निश्चित होते. राजकारण्यांनी केलेला भ्रष्टाचार लोक जसे जसे जास्त शिकतील तसा तसा खरेतर कमीच व्हायला हवा. पण घडतंय काय तर उलटे. दिवसेन दिवस भ्रष्टाचाराचे आकडे वाढतेच. करातला तितका पैसा खाल्ला म्हणून तर राग आहेच पण, त्याही उपर लोकांबद्दलची आस्था आणि त्यांच्या प्रश्नाबद्दलची संवेदनशीलता नष्ट होण्याच्या मार्गाला लागलीये याचा फार राग येतो. करोडोंच्या देशात मोजकेच शहाणे उरलेत की  काय? शेंबूड पुसणारे पोरही आम्हाला आमचे नेतृत्व वाटायला लागते तेंव्हा सक्रिय राजकारणात तळमळीने प्रामाणिकपणे ज्यांनी XX घासलीये त्यांच्या उदेश्यावर ही संशय घ्यावासा वाटतोय. मोजके सोडले तर दादा, भाऊ, बंटी असल्या चिरकुटा शिवाय कुणाचे राजकारण नाही. इतके सारे सुशिक्षित आपल्याकडे आहेत, तेथे ही जर असलेच शेंबडे निवडून येणार असतील तर तुमच्या शाळेच्या सरर्टिफिकेटवर नक्कीच संशय  येईल. पण सगळ्यांच्याच सरर्टिफिकेटवर कसा संशय घ्यावा ? म्हणजे शिक्षण पद्धतीतच असे नागरिक तयार करण्याचे शिक्षण दिले जात असावे. गुलामांच्या फ्याकट्रयाच.

मागे एका शेतकरी संघटनेच्या नेत्यांनी या सगळ्या परिस्थितीवर हताश होवून बोलत असतांना एक अनुभव सांगितला. अतिशय लागणारा आणि मार्मिक असाच -
तर हे नेते असेच एक मोठ्या शहरातून गावाकडे ट्रेन ने निघाले होते. गाडी स्टेशनवर आल्यावर यांनी खिडकीतून एका गृहस्थाला जागा ठेवायला सांगितली. यांच्या खिशाला शेतकरी संघटनेचा बिल्ला बघून खिडकीतूनच गृहस्त म्हणाले 'अहो आजकाल तुमची शेतकरी संघटना फारच थंड झाली आहे.' आधी आत तर येवू द्या अस म्हणून शेतकरी नेते आत गेले आणि त्यांच्या समोर बसले आणि त्या गृहस्ताला त्यांचा परिचय विचारला. तर गृहस्तांनी आपण निवृत्त प्राध्यापक असून काहीतरी कामानिमित्य इकडे आलो होतो असा परिचय करून दिला. तेंव्हा आमचे हे नेते म्हंटले, तर आता सांगा तुम्हाला आमच्या शेतकरी संघटनेची थंड हवा कधी आणि कोठे लागली ते. गृहस्त शांत. पुढे नेते बोलते झाले, तर तुम्ही सगळे म्हणजे तुम्ही सगळे शिकले लोक 'खोजे' झालेले आहात. तेंव्हा गृहस्तांनी 'खोजे' म्हणजे काय असे विचारताच नेते हसून म्हंटले, आता निवृत्त प्राध्यापक तुम्ही, तुम्हाला त्याचा अर्थ चांगला माहीत असावा. थोडेशे ओशाळले निवृत्त प्राध्यापक शांत बसलेले पाहून यांनीच त्याचा अर्थ स्पष्ट केला. तर तो असा की इस्लामी राजवटीत बादशाह लोक त्यांच्या संख्येने खूप असलेल्या बायकांच्या सेवेसाठी आणि संरक्षणासाठी काही पुरुष नेमत. पण ते पुरुष नपुंसक केलेले असत. तर अशे हे 'नपुंसक केलेले संरक्षक, सेवक किंवा रखवालदार म्हणजे खोजे' अशी व्याख्या सांगताच प्राध्यापक साहेब ते आम्ही कसे? असा प्रश्नकरते झाले. नेत्यांनी अगदीच स्पष्ट करतांना म्हंटले, राजकारण्यांपेक्षा शिकलेले? तुम्ही! हुशार? तुम्ही! संखेने जास्त? तुम्ही! तरीही व्यवस्थेला तुम्ही म्हणजे फक्त राखणदार! ती आहे तशीच ठेवणे हे आपले परम कर्तव्य समजून तुम्ही तिला फक्त आणि फक्त राजकारण्यांची बनवून ठेवली. पुढे नक्कीच काहीच चर्चा झाली नसणार.

तर या नेत्यांनी आमचेही डोळे चांगलेच उघडले. सगळे अव्यवस्थेचे खापर इथच्या मजूर, गरीब आणि शेतकरी वर्गावर फोडून फक्त लिखित आणि तोंडी हिरोगिरी करणारे आमच्यासारखे शिकलेले या पापाशी आपले देणे घेणे नाही अस म्हणून बसलेत. अशात  कधी कधी मेणबत्त्या घेवून आणि काळ्या रिबिनी लावून निषेध व्यक्त करतात. बर त्याचा खरच काही उपयोग झाला असता तर नक्कीच स्तुती केली असती. पण ज्यांना कोर्टाच्या निर्णयाचाही फरक पडत नाही त्यांना तुमच्या निषेध-निषेध-निषेध चा काय फरक पडणार? आंदोलने आणि चाळवळीही जागृतीच्या पलीकडे काहीच करू शकत नाहीत इतक्या नपुंसक झाल्यात. कमीत कमी अशातल्या या काही अनुभवावरून तरी. झालेली जागृती पुढे क्षणात मिटवून टाकायला क्रिकेट, करीना किंवा मग जालीम अशे उपाय म्हणजे  तुमचे 'शायनिंग इंडिया' किंवा मग 'डायरेक्ट टू अक्काउंट' आहेच. रोज रोज होणाऱ्या बेगडी आणि चमकू चळवळीनी पोटापासून ओरडनार्यांचे आवाज ऐकूच येत नाहीत. मग खरा प्रश्न्न बाजूला राहून 'पंतप्रधान बाहेर येवून का नाही बोलला' हाच मुख्य मुद्दा होतो. मग पंतप्रधानही  फक्त  'मुख्यच' मुद्याचे उत्तर देतात. सगळे समाधानी. चार दिवस जागृतीचे. बाकीचे सगळे स्त्री भ्रूणहत्येचे, विनयभंगाचे, बलात्काराचे, समाज सेवकांच्या बदडण्याचे, शेतकऱ्यांच्या आत्महत्येचे, घसरणाऱ्या रुपयाचे आणि हे सगळ तितकेही गंभीर वाटू नये म्हणून सतत टी. व्ही. वर येणाऱ्या मनोरंजनाच्या कार्यक्रमाचे, जिंकलेल्या क्रिकेटचे, दिलेल्या प्याकेजचे किंवा नागरिक साला भाकरीत गुंतून पडवा म्हणूनच कदाचित वाढलेल्या महागाईचे आणि व्याज दाराचे.

आपले प्रतिनिधी कसे आहेत यावरून आपण किती चांगले आणि आपण कुठे जातोय याचाच अंदाज येत असतो. देश काही मोजक्यांनाच चालवण्यासाठी आउट-सोर्स केलाय अस वागून या वेळी तरी चालणार नाही. येणाऱ्या इलेक्शनला सोमे-गोमे पुन्हा निवडून आले तर आपल्या मुली घराबाहेर पडू देवू नका, आपल्या पोरांना गुलाम म्हणून जगण्याची शिकवण द्या, घर बीर न घेता कुण्या तरी नेत्याने आणि उद्योजकाने  बांधलेल्या सदनिकांमध्ये आयुष्यभरासाठी किरायाने राहण्यासाठी समान बांधून ठेवा, मानेला ताठ ठेवण्यासाठी जसे बेल्ट मिळतात तसेच मान कायम खाली ठेवण्यासाठी बेल्ट आताच स्वस्तात मिळाले तर ते ही  घेवून ठेवा कारण येणाऱ्या काही वर्षात त्याचीही गरज भासेल. आणि नकोय अस भविष्य तर डोक्याने मतदान कुण्याही पक्षाला करा पण प्रामाणिक आणि स्वाभिमानी माणसांनाच करा.

पण फक्त त्याने चालणार नाही तर निवडणुकी पूर्वीच तुमचा कल दाखवून द्या. म्हणजे तिकिटे सुद्धा अशाच लोकांना मिळतील. इतका मोठा बदल सोप्पा नसतोच, पण तरी करायचा निश्चय आम्ही तरुणांनी मुख्यमंत्री.कॉम वर केलाय. आमच्या या प्रवासाचा भाग व्हा, सामील व्हा. आपण सगळ्यांनी सोबत प्रयत्न केले तर किती नक्कीच बदल होईल. येथे  (https://www.facebook.com/swaraj.manepatil8) ला काननेक्ट व्हा म्हणजे संपर्कात राहता येईल. डोक्यातल्या विचारांना फक्त डोक्यात ठेवले तर पश्चातापाशिवाय दुसरे काहीच करता येणार नाही. 

जय हिंद. !
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महाराष्ट्रातील राजकारण आणि स्त्रिया !

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 भ्रष्टाचार आणि गुन्हेगारीची बजबजपुरी अशी राज्याची प्रतिमा. जोडीला दारिद्र्य अन् प्रचंड सामाजिक विषमता. बायकांच्या खुलेआम शोषणाचा इतिहास. याला कंटाळून राज्य सोडून जगणं शोधायला बाहेर पडलेल्या झुंडी. या पार्श्वभूमीवर बिहारमध्ये हे घडलं.

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दोन बातम्या.

गेल्या पंधरा दिवसातल्या.

पहिली बातमी - महाराष्ट्रात 'आदर्श' खांदेपालट होऊन नवं मंत्रिमंडळ सत्तेत आलं. त्यात दोन महिला मंत्री. त्यातल्या वर्षा गायकवाड कॅबिनेट मंत्री अन् दुसऱ्या फौजिया खान राज्यमंत्री. राज्यातल्या साडेपाच कोटी महिलांचं प्रतिनिधित्व मंत्रिमंडळात करणार फक्त दोघीजणी. एकूण ४० मंत्र्यांमध्ये दोघी म्हणजे सत्तेतला वाटा ५ टक्के. हे अनपेक्षित अजिबात नव्हतं. धक्कादायक तर त्याहूनही नव्हतं. राज्यात निवडून आलेल्या इनमिन १८ महिला आमदारांपैकी दोघी मंत्री झाल्या. दोन पक्षांचं सरकार. त्यात प्रत्येक पक्षाची एक. एकीलाही घेतलं नसतं तर उगाच चचेर्ला खाद्य. त्यापेक्षा मंत्रिपदं देऊन टाकू या असा शहाणपणाचा निर्णय यामागे होता. याहून अधिक काही नाही.

दुसरी बातमी- बिहारमधली. नुकत्याच तिथं विधानसभेच्या निवडणुका झाल्या. नितीशकुमार यांचं सरकार पुन्हा सत्तेत आलं. या विधानसभेत बिहारमधून एकूण ३४ महिला निवडून आल्या. गेल्या ४८ वर्षांच्या राजकारणात हे पहिल्यांदाच घडलं. ज्या राज्यात काल परवापर्यंत बायका-मुलींचे सौदे व्हायचे, बंदुकीच्या धाकावर हवी ती बाई उचलून नेली, तर हाक ना बोंब, एवढं असुरक्षित वातावरण होतं त्या बिहारमध्ये हे घडलं. त्यात आणखी गंमत म्हणजे निवडणुकीसाठी मतदान करणाऱ्यांमध्येही ५४ टक्के महिला होत्या! 'जेडीयू'नं तिथं २४ महिलांना उमेदवारी दिली होती, पैकी २३ निवडून आल्या. म्हणजे 'पडेल' जागांवर बायकांना उमेदवाऱ्या देऊन केलेली ही धूळफेक नव्हती.

दोन्ही बातम्या विचार करायला लावणाऱ्या. एका राज्याला महिला चळवळींची मोठी पार्श्वभूमी. थेट सावित्रीबाई फुल्यांपर्यंत मागे जाता येईल एवढी. बायकांच्या शिक्षणाचं प्रमाण मोठं. सुबत्ता अधिक. राज्यात सातत्याने पुरोगामी म्हणवणारे पक्ष सत्तेत. दुसरीकडे भ्रष्टाचार आणि गुन्हेगारीची बजबजपुरी अशी राज्याची प्रतिमा. जोडीला दारिद्य अन् प्रचंड सामाजिक विषमता. बायकांच्या खुलेआम शोषणाचा इतिहास. याला कंटाळून राज्य सोडून जगणं शोधायला बाहेर पडलेल्या झुंडी. या पार्श्वभूमीवर बिहारमध्ये हे घडलं. त्यासाठी पाच वर्षं पुरली. तिथे बायकांच्या राजकीय सहभागात एकदम क्रांतिकारी बदल घडलाय असं अजिबात नाही, पण गुन्हेगारी, दारिद्य, भ्रष्टाचार, विषमता यांचं प्रतीक म्हणून ज्या राज्याचं नाव हिणवल्या भावनेनं घेतलं जायचं, तिथं हे घडलंय! पाच वर्षांपूवीर् राजधानी पाटणामध्ये संध्याकाळी सात साडेसात वाजता रस्ते सामसूम व्हायचे. पुरुष रस्त्यावर फिरकायची हिम्मत करायचे नाहीत, तिथं आज संध्याकाळी कॉलेजातल्या तरुण मुली स्कूटरवर बिनधास्त हिंडू शकतात, इतका मोठा बदल पाच वर्षांत घडला...राजकीय इच्छाशक्तीमुळे काय घडू शकतं याचं हे उदाहरण. राजकीय पक्षांनी मनावर घेतलं तर महिलांचा सत्तेतला सहभाग हा अशक्य नाही, हे सिद्ध करणारी बिहारची बातमी म्हणूनच आश्वासक.

महाराष्ट्रातल्याच नव्हे तर देशभरातल्या बायकांच्या राजकीय सहभागाबद्दल थोड्याफार फरकाने सारखंच चित्र. तेच ते मुद्दे. शिळ्या कढीला ऊतआणावा तशा चर्चा. पण बदल काहीच नाहीत. १९७३ मध्ये स्थानिक स्वराज्य संस्थांमध्ये बायकांना ३३ टक्के आरक्षण मिळालं, तेव्हा एका नव्या युगाची सुरुवात झाल्याचं आश्वासक चित्र निर्माण झालं होतं. टप्प्याटप्प्याने विधानसभा आणि लोकसभेतही आरक्षण येईल, खालच्या स्तरांवर राजकीयदृष्ट्या साक्षर झालेल्या बायका सक्षम होऊन समर्थपणे वरच्या स्तरावरचं राजकारण हाताळतील, अशी अपेक्षा होती. सतरा वर्षं उलटून गेल्यावरही हे घडलं मात्र नाही. स्थानिक स्वराज्य संस्थांमध्ये गाव आणि तालुका पातळीवरच्या सगळ्या अडचणींना पुरून उरलेल्या बायका राजकारण आणि विकासाची सांगड घालत अत्यंत उत्तम काम करताहेत. त्यांच्या राजकीय महत्त्वाकांक्षा वाढल्यात. आता त्यांना विधानसभेत, लोकसभेत जायचंय. पण त्यांच्या वाटा जिल्हा परिषद, महापालिकेत पोहचवून बंद झाल्यात. 'हवं तर पन्नास टक्के आरक्षण घ्या, पण खालच्या स्तरांवर. तिथं जिरवा तुमच्यातल्या नेतृत्त्वाची हौस अन् राजकारणाची रग. जिथं धोरणं ठरतात, कायदे बनवले जातात...तिथं पोहोचायचा विचार मात्र करू नका, आम्ही आहोत ना 'समर्थ' ही पुरुषी मनोवृत्ती सगळ्या पक्षांमध्ये सारखी. सगळ्या प्रमुख राजकीय पक्षांत महिला सेल वगैरे... या पक्षांच्या महिला सेलच्या राष्ट्रीय अध्यक्षपदी कोण आहे, हे किती जणांना ठाऊक असेल? यावरून या सेलचं महत्त्व ध्यानात यावं. घरातल्या शोकेसमध्ये शोभेच्या वस्तू असाव्यात तसे हे सेल. अधिवेशनात एका रंगाच्या साड्या नेसून फोटो काढण्यापुरते. कोणत्याही पक्षाच्या धोरणं ठरवणाऱ्या समितीत बायका किती हे तपासून पाहावं. अगदी सोनिया, मायावती, ममता, जयललितांच्या पक्षांची हीच कथा. जिथं पक्षसंघटनेतच जबाबदाऱ्या आणि अधिकारांचं वाटप समान नाही, तिथं थेट सत्तेतल्या सहभागाविषयी बोलणं दूरची गोष्ट.

तिकीट देताना निवडून येण्याची पात्रता हा मुख्य निकष. निवडणुकांच्या राजकारणात बदललेल्या निकषांनुसार पैसा असायला हवा आणि बाहुबल. कार्यकर्ता...नेता...सत्ता हा प्रवास कधीच कालबाह्य झालाय. थैल्या घेऊन येणारी माणसं सत्तेची ऊब चाखू लागलीत. असं असताना बायकांचा टिकाव कसा लागणार, हा युक्तिवाद केला जातो. बायकांना संधी देऊन हे चित्र बदलता येणं शक्य आहे, हा विचार कुठेही नाही. किंबहुना ही सत्तेची गणितं त्यांच्या कुवतीपलीकडची हा समज कायम. समाजात वेगळ्या वाटेनं जाणाऱ्या बायकांचं कौतुक होतं, त्यांना सपोर्ट मिळतो. पण राजकारणातल्या बायकांबद्दल जाम अढी. इंदिरा गांधी वगैरे ग्रेट, पण त्या दुसऱ्यांच्या घरात जन्मल्या तर बरं! निवडून गेलेल्या, सत्तेतल्या बायकांचं प्रगतीपुस्तक बघा, असाही खवचट प्रश्ान् येतो. कशी दिसणार ती? त्यांच्याकडे दिल्या जाणाऱ्या खात्यांपासूनच पंक्तिप्रपंचाला सुरुवात. पक्षाच्या पातळीवर सभागृहात बोलण्याची संधी किती बायकांना दिली जाते? बोलणाऱ्या बुजुर्गांची नावं आधीच ठरलेली. नव्यांना, त्यातही बायकांना जेमतेम संधी. कधीतरी किरकोळ प्रश्ान् नाहीतर, श्रद्धांजली वाहताना त्या तोंड उघडणार. एरवी 'लीला उभी राहिली आम्ही नाही पाहिली' अशी अवस्था. हळू आवाजात बोलणाऱ्या मंत्रीणबाईंचा हुयोर् उडवून त्यांची उत्तरंही ऐकून घेतली जात नाहीत, तिथं त्यांचा प्रभाव कसा पडावा?

खुल्या स्पधेर्त उतरून एखादी बाई लागलीच डोईजड व्हायला की हुकमी शस्त्र परजायचं, तिच्या चारित्र्याचा मुद्दा चघळायला सुरुवात करायची! एरवी सगळ्याच क्षेत्रात हमखास लागू पडणारं हे हत्यार राजकारणातल्या बायकांसाठी आणखी सोपं. इथे पुढे जायचं तर गट, गॉडफादर हे सांभाळणं आलं. दौरे, कार्यक्रम आले. त्यामुळे पावलोपावली 'पुरावे' ! किती खालच्या पातळीवर जाऊन आपल्याकडे ते वापरलं जातं याचंही उत्तम उदाहरण याच महिन्यातलं. माजी सरसंघचालक के. सुदर्शन यांनी सोनिया गांधीबद्दल उधळलेली मुक्ताफळं वाचून, कुठल्याही संवेदना शाबूत असलेल्या माणसानं लाजेनं मान खाली घातली असेल. सोनियांच्या औरस असण्यापासून त्यांनी राजीव गांधींना मारल्यापर्यंतचे किळसवाणे आरोप. एका बलाढ्य पक्षाच्या अध्यक्ष महिलेला हे सहन करावं लागतं, तर ग्रामपंचायतीची निवडणूक लढवणाऱ्या एखाद्या सासुरवाशिणीचं काय होत असेल? चारित्र्य ही बाईनं जपायची गोष्ट. पुरुषांसाठी ते फारच ऐच्छिक. राजकारणी पुरुषांबाबत तर नियम अगदीच शिथील!

या क्षेत्रातल्या लैंगिक शोषणाचे किस्से म्हणजे गप्पा हमखास रंगवणारा विषय. महिला राजसत्ताच्या भीम रास्करांशी बोलताना ते म्हणाले की, लैंगिक शोषणविरोधी कायद्यात आस्थापनांपासून शाळा, हॉस्पिटलांपर्यंत विशाखा समित्या नेमणं सक्तीचं केलंय, मग हे पक्षसंघटनांसाठी का नाही? आहे ना मुद्द्याची गोष्ट?

तर हे असं आहे. आहे जुनंच. काही बदलत नाही, किंबहुना बदलू द्यायचं नाही, याचं दु:खं आहे. स्त्री चळवळी थंडावल्याचा मोठा फटका बायकांच्या राजकीय प्रवासाला बसलाय. त्यामुळे ३३ टक्के आरक्षणाची वाट पाहणं हेच अपरिहार्यपणे उरतं. पण खरं सांगायचं तर त्याची वाट न पाहता राजकीय पक्षांनीच याची सुरुवात करणं गरजेचं आहे. राजकीयदृष्ट्या बायका सजग होताहेत. आरक्षण तर आज ना उद्या द्यावंच लागेल. पण जेव्हा ते मिळेल तेव्हा पक्षांकडे तेवढ्या जागांवर उभ्या करायला बायकांची नावंही नसतील ही शक्यता दाट. काळाची ही पावलं ज्यांनी ओळखली ते पक्ष तेव्हा राजकीय पटावर पुढे असतील. ज्यांना हे उमगूनही करायचं नाही त्यांच्या पायावरचा धोंडा अटळ आहे. तेव्हा जरा आपल्या राज्याचंही 'बिहार' करूया...
 

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हे राजकारण नव्हे..

हे राजकारण नव्हे...गचकरण होय !
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लोकांना राजकीय पक्ष हवे आहेत ते काही केवळ लेबल म्हणून किंवा कोणत्या तरी प्रतीकांचे घाऊक प्रतिनिधी म्हणून नव्हे; किंवा एखाद्या थोर नेत्याची सावली मिळविण्यासाठी लोक पक्षात जात नाहीत. त्यांना स्वत:ला काही तरी म्हणायचे आणि करायचे असते..
राजकीय पक्षांबद्दल चांगले बोलणारे लोक फारच थोडे सापडतात! पक्षांशिवाय राजकारण चालू शकते असे काही लोकांना वाटते, पण असे होणे खूपच अशक्य कोटीतले आहे. कारण निवडणूक आणि सार्वजनिक निर्णय म्हटले की मतभिन्नता होणे आलेच. तसेच एकसारखी मते किंवा विचार असणारे लोक एकत्र येऊन आणि गट स्थापन करून आपल्या मनासारखे निर्णय व्हावेत म्हणून प्रयत्न करणार हेही ओघानेच आले. लोकांशिवाय पक्ष असू शकत नाहीत आणि पक्षांशिवाय राजकारण असू शकत नाही.
आणि तरीही, लोक पक्षांना नावे ठेवतात किंवा पक्षांपासून दूर राहायला बघतात. राजकीय पक्षांबद्दल लोकांच्या मनात बहुतेक वेळा संशय आणि दुरावा असल्याचे दिसते. त्यातही भारतात लोकांना पक्षांबद्दल अविश्वासही खूप आणि जवळीकही खूप, असे काहीसे गमतीचे आणि गुंतागुंतीचे चित्र आढळते.
गेल्या सुमारे तीन दशकांत राजकारण आणि पक्षीय स्पर्धा यांच्याविषयी जनतेला परस्परविरोधी अनुभव आलेले दिसतात. १९७० च्या दशकात आधी खूप लोकप्रिय असलेल्या काँग्रेस पक्षाने सरकारी दडपेगिरी करून आणीबाणी आणली हा एक धक्का होता. आणीबाणीनंतर जनता पक्षातील फाटाफूट हा सार्वत्रिक उद्वेगाचा मुद्दा ठरला. त्यानंतर राजीव गांधी यांच्या नेतृत्वाविषयी झपाटय़ाने लोकांचा भ्रमनिरास झाला. १९८९ मध्ये काँग्रेसचा पराभव झाला आणि त्याचबरोबर राजकीय अस्थिरता आणि अनागोंदी यांचाही जन्म झाला.
पक्षांचा प्रस्फोट
नव्वदीचे दशक हे राजकीय पक्षांच्या प्रस्फोटाचे दशक म्हणता येईल. १९८९ नंतर पक्षांचे मोठे पीक आले आणि थेट संसदेत पोहोचणाऱ्या पक्षांची संख्याही बऱ्यापैकी वाढली. गेली पंधरा-वीस वर्षे लोकसभेत एकूण पस्तीस ते चाळीस पक्षांचे प्रतिनिधी असतात. या घडामोडींतून दोन परस्परविरोधी प्रतिक्रिया जन्माला आल्या. एकीकडे अस्थिरता, पक्षांतरे, आघाडय़ांची पुनर्माडणी वगैरे गोष्टींमुळे लोकांना पक्षांवर असणारा विश्वास मर्यादित राहिला. दुसरीकडे अनेक नव्या पक्षांच्या निर्मितीमुळे विविध समूहांना प्रतिनिधित्व मिळाले आणि त्यामुळे त्यांची राजकीय प्रक्रियेशी जवळीक वाढली. अनेक लोकसमूहांना प्रथमच आपले प्रतिनिधित्व करणारे पक्ष मिळाल्यासारखे वाटले, पण त्याबरोबरच राज्यकारभार करण्याचे किमान कौशल्य बरेच पक्ष ना केंद्रात दाखवू शकले ना आपापल्या राज्यात दाखवू शकले.
तसे तर आपल्या देशात वाटेल तेवढे पक्ष नेहमीच अस्तित्वात असतात. कारण पक्ष बनण्यासाठी जवळपास काहीच अटी नाहीत. निवडणूक आयोगाकडे नोंद करायची म्हणजे झाला पक्ष स्थापन. त्याच्यासाठी सभासद संख्येची किंवा सभासद नोंदणीची गरज नाही. म्हणजे पक्ष निर्माण होतो तोच मुळी सभासद वगैरेंच्या शिवायच. आपण एकेक पक्ष स्थापन होण्याचा इतिहास पाहिला, तरी असे दिसते की बहुतेक वेळा एखादा गट किंवा नेता नाराज झाला की आधीचा पक्ष सोडून दुसरा पक्ष स्थापन केला जातो. जानेवारी २०१३ मध्ये निवडणूक आयोगाकडे नोंद असलेले एकूण पक्ष तब्बल १३९२ इतके होते.
जवळीक आणि दुरावा!
१९९६ पासून होत असलेल्या राष्ट्रीय निवडणूक अभ्यासातून एक परस्परविरोध स्पष्टपणे पुढे येतो. १९८९ पासूनच्या अस्थिर पक्षव्यवस्थेची प्रतिक्रिया म्हणून १९९६ मध्ये झालेल्या सर्वेक्षणात तब्बल ३९ टक्केलोकांनी आपला पक्षांवर अजिबात विश्वास नसल्याचे सांगितले, तर जेमतेम १७ टक्के लोकांचा पक्षांवर पुरेसा विश्वास होता. मात्र त्याच वेळी आणि त्याच सर्वेक्षणात ३१ टक्के लोकांनी कोणता ना कोणता पक्ष आपल्याला जवळचा वाटत असल्याचे नमूद केले होते! म्हणजे 'तुझे नि माझे जमेना अन् तुझ्यावाचून करमेना' असा हा जनता आणि पक्ष यांचा विचित्र संबंध होता. त्याला १५ वर्षे उलटून गेल्यावर आणि सरकारे स्थिरपणे आपली मुदत पूर्ण करू लागल्यावर या परिस्थितीत थोडा बदल झाला आहे. एक तर पक्षांवर विश्वास नसलेले आणि विश्वास असलेले यांचे प्रमाण आता जवळपास एकास एक असे आहे - म्हणजे शंभरातील १६ व्यक्तींचा पक्षांवर अजिबात विश्वास नाही तर १८ व्यक्तींचा पुरेसा विश्वास आहे, असे २००९ च्या अभ्यासातून पुढे आले. कोणता ना कोणता राजकीय पक्ष जवळचा वाटणाऱ्या लोकांची संख्या २००९ मध्ये २८ टक्के एवढी होती - म्हणजे ती कमी झाली असली, तरी त्यात फार मोठा फरक पडलेला नाही.
आता हे खरे, की एखादा पक्ष 'जवळचा वाटणे' ही तशी खूपच फसवी गोष्ट आहे. भारतात फारसे कोणतेच पक्ष काटेकोरपणे सभासदांची यादी ठेवत नाहीत. त्यामुळे खरोखरच किती व्यक्ती एखाद्या पक्षाच्या अधिकृत आणि नियमित सभासद आहेत याचा पत्ता लागणे दुरापास्त आहे. राजकीय पक्षांचा कारभार पारदर्शीपणे चालावा असा आग्रह धरणाऱ्या संघटना पक्षांच्या सभासद-याद्या नीट असाव्यात असा आग्रह धरतात. पण त्याचबरोबर हेही लक्षात घेतले पाहिजे, की आपली राजकीय बांधीलकी व्यक्त करण्याच्या रीती आपल्या देशात अगदी वेगळ्या आहेत. सभासद म्हणून नोंद करणे हा त्यातला एक काहीसा गौण भाग आहे. त्यामुळेच वर उल्लेख केलेल्या सर्वेक्षणांमध्ये १९९६ साली सहा टक्के आणि २००९ मध्ये आठ टक्के लोकांनी आपण एखाद्या पक्षाचे सभासद असल्याचे नोंदविले होते.
पक्षांशी असणारी ही जवळीक आणि सभासदत्वाची आकडेवारी कॅनडा, इंग्लंड किंवा ऑस्ट्रेलियापेक्षा चांगली आहे - तिथे सध्या फक्त चार ते पाच टक्के लोकच स्वत: कोणत्या तरी पक्षाचे सभासद असल्याचे सांगतात आणि पक्ष सभासदत्वाची माहिती गोळा करणाऱ्यांच्या मते तर एक ते दीड टक्का एवढेच लोक कोणत्याही पक्षाचे सभासद असतात. त्यामुळे आपल्या पक्षांना नावे ठेवण्यापूर्वी जगभर राजकीय पक्षांविषयी जी उदासीनता आहे, तिच्या तुलनेत आपल्या देशात लोक आणि पक्ष यांचे संबंध जास्त जवळिकीचे आणि जिवंतपणाचे आहेत हे लक्षात ठेवायला हवे.
पक्षांपुढील आव्हान
लोकसंपर्काचे एवढे भांडवल असतानादेखील आपल्या देशातील राजकीय पक्ष धड वागत नाहीत आणि लोकांच्या विश्वासाचा आदर करीत नाहीत आणि राजकारणाचे अधिक लोकशाहीकरण करण्यास हातभार लावत नाहीत, ही राजकीय पक्षांबद्दलची तक्रार मात्र रास्त ठरेल.
भारतातील पक्षांची रचना आणि कार्यपद्धती सभासद-केंद्रित नाही. पक्षांचा सर्व भर नेते, प्रतिमा, प्रतीके आणि गर्दी यांच्यावर असतो. बहुसंख्य पक्ष हे नेत्याच्या नावानेच ओळखले जातात. त्यांचे सर्व अस्तित्व त्या नेत्याच्या राजकीय कारकिर्दीशी संलग्न असते. दुसरीकडे पक्षाची लोकप्रियता प्रतीकांच्या भोवती किती भावनिक उठाव निर्माण केला यावर ठरते. राजकीय पाठिंबा मिळविण्याच्या या पद्धतीमुळे नियमित सभासद आणि त्यांचा स्थायी स्वरूपाचा पाठिंबा यांची गरज कमी असते. त्याऐवजी थेट लोक-संघटन करण्याचे आणि लोकांच्या नजरेपुढे राहण्याचे उपाय योजले जातात. दिखाऊ कार्यक्रम आणि फलकांचे देखावे हे त्याचेच आविष्कार असतात. त्यामुळे सभासद किंवा सहानुभूतीदार यांचे फारसे काम उरत नाही.
म्हणूनच मग, ज्यांना सार्वजनिक जीवन आणि सरकारचे निर्णय यांच्यात हस्तक्षेप करण्याची इच्छा असते अशी माणसे पक्षांविषयी निराश होऊन इतर माध्यमे शोधताना दिसतात. भारतात गेल्या वीस-पंचवीस वर्षांत सार्वजनिक सहभाग घेऊ इच्छिणाऱ्या अशा क्रियाशील नागरिकांचा ओढा एक तर एखाद्या छोटय़ा चळवळीकडे असतो किंवा बिगरपक्षीय संघटनेकडे असतो. यातून राजकीय पक्षांचीदेखील कोंडी होते आहे. त्यांना अशा क्रियाशील व्यक्तींच्या सहभागाला मुकावे लागते आणि पक्षबाह्य़ दडपणांना तोंड द्यावे लागते. गेल्या दोनेक वर्षांमध्ये पक्ष आणि सामाजिक संघटना (नागरी समाज) यांच्यात जे द्वंद्व उभे राहिलेले दिसते आहे, त्याचे एक कारण पक्षांच्या कार्यपद्धतीमध्ये आहे. लोकांना पक्ष हवे आहेत ते काही केवळ लेबल म्हणून किंवा कोणत्या तरी प्रतीकांचे घाऊक प्रतिनिधी म्हणून नव्हे; किंवा एखाद्या थोर नेत्याची सावली मिळविण्यासाठी लोक पक्षात जात नाहीत. त्यांना स्वत:ला काही तरी म्हणायचे आणि करायचे असते.
अशा लोकांना वाव देण्याचे आव्हान पक्षांपुढे आहे. पण हे आव्हान दिसते तेवढे सोपे नाही. कारण क्रियाशील नागरिकांना पक्षात जागा द्यायची, वाव द्यायचा याचा अर्थ पक्ष चालविण्याची पद्धत बदलावी लागेल. या आव्हानालाच काही वेळा 'पक्षांतर्गत लोकशाही'चे आव्हान असे म्हणतात. पण हा प्रश्न फक्त पक्षात जास्त मोकळेपणा किंवा पारदर्शीपणा आणणे एवढाच नाही.
आपण पक्ष आहोत म्हणजे काय आणि लोकांनी आपल्या पक्षात कशासाठी यावे आणि पक्षात येऊन काय करावे याच्याबद्दलच्या कल्पना बदलणे असे या आव्हानाचे स्वरूप असेल. एका बाजूला पक्षांच्या नेत्यांना स्वत:मध्ये बदल करावा लागेल तर दुसरीकडे पक्ष 'चालविणारे' राजकीय उद्योजक हटवून वेगळ्या पद्धतीने पक्ष चालविण्याची तयारी दाखवावी लागेल. हे आव्हान मोठे आहे आणि आज तरी कोणताच प्रचलित पक्ष असा प्रयत्न करायला तयार होईल अशी शक्यता नाही. त्यामुळे लोकांना पक्ष हवे आहेत, पण सध्या असलेले पक्ष लोकांना सामावून घेण्यास असमर्थ आहेत, अशी लोकशाही राजकारणाची कोंडी चालू राहणार हीच शक्यता जास्त आहे.

कार्यकर्त्यांचे इंधन...!!

कार्यकर्त्यांचे इंधन...!!
सर्व पक्षीय कार्यकर्त्यांचे मनातील कथन..!!

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निवडणुकीत उमेदवारांना असंख्य कार्यकर्त्यांची मदत घ्यावी लागते. विजयी झाल्यानंतर मग उमेदवाराकडून या कार्यकर्त्यांना वेगळ्या स्वरूपात आपल्या कामाचा मोबदला हवा असतो.. ही देवाण-घेवाण मग पुढे दीर्घकाळ चालूच राहते आणि त्यातूनच वाढतात 'राजकारणबाह्य़' कामे अन् गुंडगिरी..

राजकारणात पैसा आणि गुन्हेगारी यांचा शिरकाव का होतो, याचे उत्तर खरे तर बरेच गुंतागुंतीचे आहे. सज्जन लोक राजकारणात जात नाहीत, हे त्याचे एक लोकप्रिय पण फार अपुरे उत्तर आहे.
स्वातंत्र्यपूर्व काळात आणि स्वातंत्र्यानंतरदेखील गांधी-लोहिया यांच्या परंपरेत सेवा आणि संघर्ष हे मध्यवर्ती मानले गेले आणि त्या खेरीजचे राजकारण हे कमअस्सल मानले गेले. मात्र स्वातंत्र्योत्तर काळात नव्या लोकशाही राज्यव्यवस्थेच्या चौकटीत सत्ता राबविणे आणि सार्वजनिक निर्णय आणि कारभार सांभाळणे हे राजकारणाचे आणखी एक रूप पुढे आले. मुख्यत: काँग्रेसपरंपरेत असे मानले गेले की, आता राजकारण म्हणजे शासन चालविणे होय. (राजकारणाविषयीची ही कल्पना एका अन्वयार्थाकडे झुकलेली होती असे म्हणता येईल; पण ती चुकीची नव्हती.) सेवा आणि संघर्ष यांच्यातसुद्धा खरे तर सत्ता मिळण्याच्या शक्यता सामावलेल्या असतातच आणि त्या अर्थाने कोणतेही राजकारण म्हणजे सत्ताकारणच असते. सत्तेचा पाठपुरावा करणे म्हणजे अर्थातच मोठय़ा प्रमाणावर जनतेचा पाठिंबा मिळविणे आलेच. विशेषत:निवडणुकीच्या राजकारणात अशा पाठिंब्याची तरतूद करण्यात राजकारणी व्यक्ती सतत गुंतलेल्या असतात. 'लोकप्रिय' नेत्यालासुद्धा आपली लोकप्रियता घडविण्यासाठी आणि टिकविण्यासाठी अनेक उपाय सतत योजावे लागतात.
दुसरी समजूत म्हणजे सतत जनतेच्या हितासाठी संघर्ष करीत राहून पाठिंबा मिळविता येतो. चळवळी-आंदोलने करणाऱ्या अनेकांचा असा अनुभव असतो की, त्यांच्या आंदोलनात मनापासून भाग घेणारे लोकही त्यांना मत देतातच असे मात्र नाही. याचा अर्थ, नेतृत्वाची प्रतिमा आणि संघर्षांची धडाडी या दोहोंना आणखी दोन गोष्टींची जोड असावी लागते. एक तर संघटना आणि दुसरी म्हणजे नियमितपणे लोकांचा पाठिंबा मिळवू शकणाऱ्या अनुयायी-कार्यकर्त्यांची साखळी.
धोरणे, विचारसारणी आणि नेतृत्व यांमुळे कार्यकर्ते गोळा होऊ शकतात. पण या तिन्ही गोष्टींची कमतरता असेल तर काय करायचे? मग आपल्याला पाठिंबा देणाऱ्यांची एक साखळी देवाण-घेवाणीच्या तत्त्वावर तयार केली जाते. म्हणजे तुमचा कार्यकर्ता मुख्यत: तुमच्याकडून काय मिळू शकते, याचा अंदाज घेऊन तुम्हाला मदत करतो. अशी कार्यकर्त्यांची साखळी मुख्यत: निवडणुकीसाठी आवश्यक असते. एकेका कार्यकर्त्यांने १०० किंवा २०० किंवा हजारभर मते मिळवून देण्यासाठी काम करायचे. त्या बदल्यात असे कार्यकर्ते वेगवेगळ्या प्रकारच्या मोबदल्याची किंवा परतफेडीची अपेक्षा करतात. कोणाला नंतर एखादे पद किंवा उमेदवारी हवी असेल किंवा त्यांच्या शब्दाखातर एखादे काम झाले पाहिजे असे त्यांना वाटत असेल. कित्येकवेळा अशा कार्यकर्त्यांना सार्वजनिक कामांची छोटीमोठी कंत्राटे दिली जातात किंवा कोणत्या ना कोणत्या समितीवर वगैरे नेमले जाते. अशा देवाण-घेवाणीच्या आधारावर कार्यकर्त्यांची साखळी निर्माण केली जाते आणि टिकविली जाते आणि त्या कार्यकर्त्यांकडून पक्षाचे किंवा त्या-त्या नेत्याचे राजकीय काम करून घेतले जाते.
हे काम अनेक प्रकारचे असू शकते- पत्रके वाटणे, मतदानाला लोकांना घराबाहेर काढणे, मतदारांशी नियमित संपर्क ठेवणे, त्यांच्या मागण्या/तक्रारी यांचा पाठपुरावा करणे, अशा खऱ्याखुऱ्या 'राजकीय' कामांबरोबरच त्या मतदारांपैकी कोण आपल्या बाजूचे नाहीत हे हेरणे, जमेल तिथे थोडी दमदाटी करणे, गरजेप्रमाणे मतदारांना प्रलोभने दाखविणे (आणि वेळ पडली तर ती प्रलोभने त्यांच्यापर्यंत पोचविणे), धाक निर्माण करून आपल्या विरोधी असणाऱ्यांना नमविणे अशी राजकारणबाह्य़ कामेसुद्धा राजकीय साखळीतल्या दुव्यांना करावी लागतात.
अशी साखळी तयार करून लोकांमध्ये वावरणे हे राजकीय पक्षाचे काम असते. पण अनेक वेळा व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा असणाऱ्या व्यक्ती वैयक्तिकरीत्या आपल्याशी बांधील अशी साखळी तयार करतात आणि पक्षाला कोंडीत पकडतात. कारण मग असे नेते एक पक्ष सोडून दुसऱ्या पक्षात गेले की त्यांच्याबरोबर ते आपली साखळी तिकडे घेऊन जातात. ते कुठेही गेले तरी स्वायत्तपणे काम करतात आणि पक्षाचे नियंत्रण फारसे जुमानत नाहीत. (अमुक नेत्याने शेकडो अनुयायांसह दुसऱ्या पक्षात प्रवेश केला असे आपण वाचतो, तेव्हा त्या बातमीतले ते शेकडो अनुयायी अशा साखळीमधले कार्यकर्ते असतात हे लक्षात ठेवले पाहिजे.) अनेक छोटय़ा शहरांमध्ये नगरपालिका निवडणुकीच्या वेळी स्थानिक शहर विकास आघाडय़ा अस्तित्वात येत असतात आणि बहुमताने निवडून येत असतात. त्यापैकी बहुतेक आघाडय़ा म्हणजे अशा स्वत:ची व्यक्तिगत साखळी असलेल्या पुढाऱ्यांच्या राजकारणाची साधने असतात. नियोजनपूर्वक अशी साखळी तयार करून सार्वजनिक साधनांचे नियंत्रण करू पाहणाऱ्या राजकीय उद्योजकांमार्फत आपले राजकारण चालते असे म्हणता येईल.
कार्यकर्त्यांची वर उल्लेखिलेली कामे पाहिली तर राजकारणात पैसा आणि गुन्हेगारीचा शिरकाव कुठून होतो ते लक्षात येऊ शकते. राजकारणात जेव्हा 'राजकारणबाह्य़' कामे वाढतात, तेव्हा राजकीय कार्यकर्ता मागे पडून गुंडगिरी आणि हातापायी करणाऱ्यांची सद्दी वाढते.
अशा कार्यकर्त्यांची फौज सांभाळायची म्हणजे भरपूर पैसा लागतो आणि तो उभा करण्यासाठी मग सार्वजनिक निर्णयप्रक्रियेचा वापर केला जातो आणि खासगी हिताला प्राधान्य दिले जाते. शहरांमध्ये नगरसेवक, राजकीय पक्ष आणि बांधकाम व्यावसायिक यांचे साटेलोटे आहे असे नेहमी म्हटले जाते. ते उदाहरण आपण पाहू. बांधकामासाठी जमीन उपलब्ध होणे, किती जमिनीवर किती आकाराचे बांधकाम करायचे याचे नियम शिथिल होणे, शहराच्या कोणत्या भागत निवासी किंवा व्यापारी बांधकाम व्हावे याचे नियम सोयीचे असणे यात बांधकाम व्यावसायिकांचे हित असते. त्यांना सोयीचे होतील असे नियम करण्याने त्यांच्याकडून उघड मार्गाने किंवा मागच्या दाराने पक्षाच्या किंवा एखाद्या पुढाऱ्याच्या राजकीय कामासाठी निधी मिळणे/मागणे सोपे शक्य होते. हे केवळ एक काल्पनिक उदाहरण झाले; अशाच उदाहरणाची कल्पना हॉटेल व्यवसाय किंवा सिनेमानिर्मिती आणि वितरणाचा व्यवसाय वगैरे बाबतीत करता येईल. म्हणजे राजकीय कार्यकर्त्यांची साखळी टिकविण्यासाठी दुसरी एक, प्रबळ आणि धनिकांच्या हिताची, साखळी तयार व्हावी लागते. ग्रामीण भागात अशा साखळ्या साकारण्यासाठी जमिनीचे व्यवहार, जमिनी बिगर-शेती करण्याचे व्यवहार, देशी दारूच्या कंत्राटाचे व्यवहार अशा हितसंबंधांचा गोतावळा तयार होऊ शकतो.
पैशाचे वारेमाप व्यवहार होऊ लागले की ते फक्त धनवान लोकांपुरते न थांबता त्यात धाकदपटशा करणारे, छोटेमोठे गुंड, खंडणी गोळा करणारे, संघटित गुंडिगरी करणारे अशा प्रकारच्या घटकांचा सहभाग वाढू लागतो आणि पक्ष व नेते हा सहभाग टाळू शकत नाहीत. सुमारे १०० वर्षांपूर्वी अमेरिकेत अनेक शहरांमध्ये अशा प्रकारे साखळीचे आणि त्यातून जन्माला आलेले गुन्हेगारी टोळ्यांचे राजकारण प्रस्थापित झाले होते. त्याला 'मशीन पॉलिटिक्स' असे नाव पडले होते.
भारतात स्वातंत्र्यानंतरची दोन दशके ही स्वातंत्र्य चळवळीचा वारसा, राजकीय पक्षांच्या वैचारिक भूमिकांमधील स्पर्धा, लोकसमूह संघटित करण्याचे प्रयत्न इत्यादींमुळे पैसा आणि बाहुबळ यांचे प्रस्थ मर्यादित होते. आधी नेहरू आणि नंतर इंदिरा गांधी यांच्या प्रबळ नेतृत्वाच्या प्रभावामुळे बाहुबळाची गरज मर्यादित होती. त्यामुळे कार्यकर्त्यांची साखळी तयार करण्याचे राजकीय मार्ग जास्त प्रचलित होते. हळूहळू त्या राजकीय मार्गाना पैशाची जोड दिली जाऊ लागली.इंदिरा गांधींच्या काळात काँग्रेसची पक्ष संघटना खिळखिळी झाली. त्यामुळे एकेका प्रबळ नेत्याने आपापली कार्यकर्त्यांची फौज तयार करायची आणि त्या आधारे पक्ष नेतृत्वाशी देवघेव करायची, या प्रथेचा रस्ता मोकळा झाला. एकटय़ा व्यक्तीने पैसा आणि कार्यकर्ते उभे करायचे म्हटल्यावर त्यासाठी गुन्हेगारी जगताची मदत घेतली जाऊ लागली. राजकारणात पैसा, प्रतिष्ठा आणि सार्वजिनक साधनसंपत्तीवर कब्जा करण्याचे मार्ग या तिन्ही गोष्टी असल्याचे दिसत असल्यामुळे राजकीय नेत्यांच्या संपर्कात आलेल्या डॉन, बाहुबली (हा खास उत्तरेकडचा शब्द!), दादा वगैरेंनी स्वत:च राजकारण करायला सुरु वात केली आणि सरतेशेवटी आता, राजकारणी आणि गुन्हेगार यांची साखळी तयार झाली. वेगळ्या भाषेत सांगायचे, तर राजकीय पक्षांनी (सार्वजनिक हितासाठीचे संघर्ष या अर्थाने) राजकारण करायचे थांबविल्यानंतर सत्तेच्या साखळीत पैसा आणि गुन्हेगारी यांच्या प्रवेशाचा मार्ग खुला झाला. राजकारणातील पैसा आणि गुन्हेगारी यांच्याबद्दल बोलायचे, तर या सगळ्या गुंतागुंतीबद्दल बोलावे लागते.


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राजकारणात ज्या व्यक्तीला विरोध होतो तीच व्यक्ती "यशस्वी" होते..!!

राजकारणात ज्या व्यक्तीला विरोध होतो तीच व्यक्ती "यशस्वी" होते..!!
 होय...हेच सूत्रच आहे. याला कोणताही नेता अपवाद नाही.

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 कॉंग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी यांना सर्वात जास्त विरोध झाला म्हणून त्या राजकारणात यशस्वी ठरल्या..
 राष्ट्रवादीचे अध्यक्ष श्री.शरद पवार हे सर्वात जास्त विरोधाचे धनी आहेत..
 शिवसेनाप्रमुख स्व.बाळासाहेब ठाकरे यांना सुधा झालेला सर्वात जास्त विरोध..
 मनसे प्रमुख श्री.राज ठाकरे यांना सुधा टोकाचा विरोध होतो..
 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे सरसंघचालक मोहन भागवत यांना सुधा तितकाच तीव्र विरोध होतो..
 भा.ज.प. नेते गोपीनाथ मुंडे यांना सुधा टोकाच्या विरोधाला सामोरे जावे लागते..

 अंतराष्ट्रीय स्तरावर पहिले तर..
 अमेरिकेमध्ये बराक ओबामा यांना सर्वात जास्त विरोध झालेला दिसेल..
 द.आफ्रिकेमध्ये नेल्सन मंडेला यांना सर्वात जास्त विरोध झालेला होता..
 अनेक-अनेक उदाहरणे आहेत.

 प्रत्येक नेत्याकडे त्याच्या कारकिर्दीकडे पहिले तर ती व्यक्ती राजकारणात यशस्वी होण्यामागे विरोध हिच गोष्ट आहे..ज्याला विरोध होत नाही तो राजकारणात यशस्वी होत नाही.
 विरोध आणि राजकारण या "श्री.गणेश आणि लक्ष्मि" या सारख्या गोष्टी आहेत.

 फक्त फरक एवढा असतो कि तो नेता कोणत्या कार्यशेत्रात काम करतो..
 ग्रामपंचायत,प.स.सर्कल,जी.प. सर्कल कि विधानसभा व लोकसभा शेत्र..जो ज्या शेत्रात काम करतो तिथे त्या व्यक्तीला जर सर्वात जास्त विरोध असेल तर ती व्यक्ती "राजकारणात" हमखास यशस्वी होते..

 जर तुम्हाला सार्वजनिक किवा राजकीय शेत्रात काम करत असताना विरोध होत असेल मग तो अंतर्गत,छुपा, किवा खुला असेल..तर लक्षत ठेवा यश तुमचे दार ठोठावत आहे..
 चालत राहा..!!

 मी रोज १२ वर्तमानपत्रे वाचतो..त्यात इंग्लिश पेपर असो कि मराठी कि हिंदी सर्वच्या सर्व ठिकाणी..प्रत्येक पेपर मध्ये निदान २ तरी बातम्या ह्या नरेंद्र मोदी या नावाच्या असतात..
 जर नरेंद्र मोदी यांना असाच विरोध होत राहिला तर, "अंतर्गत,छुपा,खुला" कोणताही विरोध असो..
 तो नरेंद्र मोदी यांना यशस्वी करणार..हे मात्र नक्की..!


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Saturday, 13 July 2013

"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा उठाव !"

"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा उठाव !"

"गर्व से कहो हम हिंदू हे..!"

ज्या अडवाणीनी द्वेषाची राजनीती चरमसीमेला नेण्यात यश मिळविले होते ते अडवाणी आता इतके मवाळ झाले कि धर्मनिरपेक्ष लोकही त्यांना मानू व मान्यता देवू लागले होते ! अशा प्रकारच्या भाजप नेतृत्वाची व पक्षाची संघाने कधीच कल्पना केली नव्हती. पक्षाच्या हिंदुत्व वादाला धार आणायची असेल तर आजचे नेतृत्व आणि पक्षाचे बनत चाललेले अधर्मवादी स्वरूप बदलण्या साठी गोव्यात संघाने जे केले त्याला उठावा पेक्षा दुसरा कोणताही शब्द वापरता येणार नाही.

भारतीय जनता पक्षाच्या गोवा बैठकीनंतर त्या पक्षाचे सर्वोच्च नेते लालकृष्ण अडवाणी यांनी पक्षाच्या पदांचा जो राजीनामा दिला होता त्याकडे त्यांची पंतप्रधान पदाची लालसा पूर्ण करण्यासाठी टाकलेला दबाव असे माध्यमांनी पाहिले. माध्यमांचे याबाबत दुमत नव्हते. राजीनाम्या नंतर आजतागायत अडवाणीजी माध्यमांना सामोरे गेले नाहीत. त्यामुळे त्यांच्या राजीनाम्याचे हेच कारण असल्याचा समज पक्का झाला. माध्यमांसमोर गेलेल्या भाजपच्या राष्ट्रीय अध्यक्षासह कोणत्याही भाजप नेत्यांनी हा समज दूर करण्याचा प्रयत्न केला नाही. पंतप्रधान बनणे शक्य असताना त्यावर पाणी सोडून वाजपेयीजीना त्या पदावर बसविणारे अडवाणी सत्तालोलुप नसल्याचे कोणत्याही नेत्याने म्हंटले नाही. माध्यमांनी निर्माण केलेला अडवाणींच्या सत्तालोलुपतेचा समज भाजप नेत्यांनी कायम का ठेवला याचे रहस्य आता उलगडू लागले आहे. भाजप प्रणित राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी सत्तेवर आली तर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाच्या इच्छे विरुद्ध पंतप्रधान म्हणून लालकृष्ण अडवाणी यांच्या नावावरच एकमत होण्याचा धोका टाळणे हाच गोवा बैठकीचा प्रमुख हेतू होता हे आता स्पष्ट होवू लागले आहे. गोवा बैठकीपूर्वी भाजपचे विद्यमान नेतृत्व आणि अडवाणी यांच्यात गुजरातचे मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी यांचेवर राष्ट्रीय जबाबदारी सोपविण्याबाबत चर्चा झाली होती . त्यात अडवाणी यांनी पक्षाचा चेहरा म्हणून नरेंद्र मोदी यांना पुढे केल्यास राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी तुटेल अशी भीती व्यक्त केली होती. शिवाय सामुहिक नेतृत्व असलेला भाजप हा एकमेव पक्ष असल्याने त्याचे हे स्वरूप कायम ठेवण्याचा अडवाणी यांनी आग्रह धरला होता. पक्ष मोदी केंद्रित झाल्याची भावना आणि समज पसरू नये यासाठी अडवाणी यांनी आगामी विधानसभा निवडणूक प्रचारासाठी वेगळी आणि लोकसभा निवडणुकीसाठी वेगळी समिती नेमण्याची सूचना केली होती. अशा दोन समित्या बनविल्या गेल्या तरअडवाणींचा लोकसभा निवडणूक प्रचार समितीच्या अध्यक्षपदी मोदींची नेमणूक करायला विरोध राहणार नव्हता हे पक्ष नेतृत्वाला चांगले ठाऊक होते. तरीही अडवाणींचा सल्ला डावलण्याचा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा सल्ला मानून मोदींना पक्षाचा चेहरा बनविण्याची घाई केली . अडवाणी यांना विश्वासात घेण्याची गरज पक्ष नेतृत्वाला वाटली नाही. उलट मोदी यांनी जबाबदारी स्वीकारल्यानंतर अडवाणीजीनी आपल्याला आशिर्वाद दिल्याचे खोटेच जाहीर करून अडवाणींची मुस्कटदाबी करण्याचा प्रयत्न केला. पक्षाला मोदींना जबाबदारी देण्याची घाई आणि मोदींना जबाबदारी स्विकारण्याची झालेली घाई हे अडवाणींच्या राजीनाम्याचे तात्कालिक कारण होते , पंतप्रधान पदाची लालसा नव्हे हे आता पडद्याआड घडलेल्या घटना आणि झालेल्या चर्चा समोर आल्यानंतर स्पष्ट झाले आहे. अडवाणी यांनी दिलेला सल्ला चुकीचा नव्हता आणि राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी तुटण्याचा बागुलबोवा त्यांनी उभा केला नव्हता तर वास्तव सांगितले होते हे गोवा बैठकीच्या निर्णयाच्या परिणामी घडलेल्या घटनांवरून सुस्पष्ट झाले आहे. मोदींचे नेतृत्व राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीला मान्य होण्यासारखे नाही हे सर्वसाधारणपणे सर्वच राजकीय विश्लेषकांचे आधीपासूनच मत होते. हे मतच गोवा बैठकीत मोदींना पंतप्रधान पदाचा उमेदवार औपचारिकरित्या घोषित करण्यात अडथळा ठरले. मोदींची नियुक्ती निवडणूकसमितीच्या अध्यक्षपदी झाली असली तरी भाजप अध्यक्षा पासून प्रवक्त्या पर्यंत सर्वानीच देशातील सर्वाधिक लोकप्रिय नेता आणि देशाचे नेतृत्व करण्यास योग्य असे एकमेव नेतृत्व अशी भलावण करून राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीच्या घटक पक्षांना योग्य तो संदेश दिला. बिहार मधील जनता दल युनायटेडने हा संदेश लक्षात घेवूनच राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीतून बाहेर पडण्याचा निर्णय घेतला. मोदींच्या बाबतीत जद्युची भूमिका नवी नाही. बिहार मध्ये मोदींनी निवडणूक प्रचाराला येवू द्यायला देखील नितीशकुमार यांनी विरोध केला होता आणि भाजपने त्यांचे म्हणणे ऐकले होते. नितीशकुमार हे पंतप्रधान पदासाठी मोदींची उमेदवारी मान्य करणार नाहीत हे माहित असतानाही आणि निर्णय झाला नसताना त्यांना पंतप्रधानपदाचा उमेदवार म्हणून रंगविण्यामागे राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी मोडीत काढण्याचा डाव असला पाहिजे असे म्हंटले तर ते वावगे वा अ-तर्कसंगत ठरणार नाही. या मुद्द्यावरून लोकशाही आघाडी सोडण्याचा मनोदय नितीशकुमार यांनी जाहीर केला तेव्हा भाजपने नाही पण संघाने मोदी फक्त निवडणूक समितीचे अध्यक्ष आहेत, पंतप्रधानपदाचे उमेदवार नाहीत अशी सारवासारव केली . पण नितीशकुमार आघाडीतून बाहेर पडल्यानंतर बिहारमधील उपमुख्यमंत्रीपदी राहिलेल्या मोदींनी घेतलेल्या पत्रकार परिषदेत पहिल्यांदाच नरेंद्र मोदींच्या रुपात मागासजातीचा पंतप्रधान मिळणार असल्याने काहींच्या पोटात भीतीचा गोळा उठल्याचा टोला नितीशकुमार यांना हाणला. यातून आघाडीची मते लक्षात न घेता नरेंद्र मोदींना पुढे करण्याचा भाजपचा मानस असल्याचे पुरेसे स्पष्ट होते. यासाठी लोकशाही आघाडी तुटली तरी भाजपला त्याची पर्वा नसल्याचे संकेत या निमित्ताने मिळाले आहेत. वाजपेयी-अडवाणी यांच्या काळात बनलेली राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी संघ-भाजपला का नकोशी झाली आहे हा विचार करण्या सारखा मुद्दा आहे.

नकोशी झालेली राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी याचे विश्लेषण असेही होते कि,
भाजपच्या गोवा बैठकीतील ज्या निर्णयाने राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी संकटात आली तो निर्णय घेण्यास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाने भाजपला बाध्य केले हे लक्षात घेतले तर भाजप पेक्षा संघाला राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीचे वावडे आहे हे लक्षात येईल. या आघाडीचे वावडे असण्याचे दोन कारणे आहेत. यातील महत्वाचे कारण ही आघाडी अडवाणी समर्थक आहे. पंतप्रधान पदाचा उमेदवार ठरवायची वेळ येईल तेव्हा या आघाडीतील घटक पक्ष नि:संदिग्धपणे अडवाणींच्या बाजूने कौल देतील. अडवाणी असताना दुसऱ्या कोणत्याही भाजप नेत्यांना आघाडीचे समर्थन मिळणे कठीण आहे. संघाने यापूर्वीच अडवाणी यांना पंतप्रधान पदाच्या स्पर्धेतून बाद केले आहे. मात्र राष्ट्रीय लोकशाही आघाडीने त्यांना या स्पर्धेतून बाद केलेले नाही. या आघाडीतील मोठा घटक असलेला जदयु तर अडवाणी यांचा कट्टर समर्थक आहे. शिवसेना, अकाली दल अडवाणी यांचे बाबतीत जदयु इतके आग्रही नसले तरी त्यांना इतर कोणापेक्षाही अडवाणी अधिक चालण्यासारखे आहेत. अडवाणी बाबत संघाचा निर्णय अंमलात यायचा असेल तर त्यात राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी आणि त्यातही जदयु हा मोठा अडथळा होता. अडवाणी आणि नितीशकुमार यांना बाहेर करण्यासाठी संघाने मोदी अस्त्राचा वापर केला आहे हे इथे लक्षात घेतले पाहिजे. मोदींची वाटचाल नेहमीच एकला चलोरेची राहिली आहे. मोदींना सुद्धा त्यांच्या महत्वाकांक्षे आड ही आघाडी येईल याची जाणीव होतीच. पक्ष आणि आघाडी यांच्या चौकटीत बंदिस्त होण्यासारखे व्यक्तिमत्व ते नसल्याने संघाने आपला हेतू साध्य करण्यासाठी योग्य व्यक्ती मानले आहे. आज पर्यंत व्यक्तिवादाचा विरोध करणाऱ्या संघाने सर्वाधिक व्यक्तिवादी असलेल्या मोदींची निवड करायला कमी केले नाही यावरून काही झाले तरी संघाला अडवाणी यांना पंतप्रधान होवू द्यायचे नाही. कारण अडवाणी यांच्या नेतृत्वाखालील आजच्या भाजपला धर्मनिरपेक्षतेचे वावडे वाटेनासे झाले होते. जे उद्दिष्ट डोळ्यासमोर ठेवून संघाने आपले राजकीय हत्यार बनविले होते ते हत्यार वाजपेयी आणि अडवाणी यांच्या काळात बोथट होवून गेले . ज्या अडवाणीनी द्वेषाची राजनीती चरमसीमेला नेण्यात यश मिळविले होते ते अडवाणी आता इतके मवाळ झाले कि धर्मनिरपेक्ष लोकही त्यांना मानू व मान्यता देवू लागले होते ! अशा प्रकारच्या भाजप नेतृत्वाची व पक्षाची संघाने कधीच कल्पना केली नव्हती. पक्षाच्या हिंदुत्व वादाला धार आणायची असेल तर आजचे नेतृत्व आणि पक्षाचे बनत चाललेले अधर्मवादी स्वरूप बदलण्या साठी गोव्यात संघाने जे केले त्याला उठावा पेक्षा दुसरा कोणताही शब्द वापरता येणार नाही. या उठावात संघाचा अराजकीय आणि सांस्कृतिक मुखवटा गळून पडला असला तरी त्याची देखील संघाने पर्वा केलेली नाही. कॉंग्रेस साठी हा सर्वाधिक अडचणीचा आणि प्रतिकुलतेचा काळ असल्याने संघाने भाजपात उठाव घडवून आणण्यासाठी ही वेळ निवडली. राष्ट्रीय लोकशाही आघाडी अधिक बळकट करून कॉंग्रेसला सहज बाजूला सारता आले असते , पण त्याने संघाचा हेतू पूर्ण होत नव्हता. रालोआ अधिक बळकट करणे म्हणजे भाजप हिंदुत्वा पासून अधिक दूर जाणे हे समीकरण तयार झाले असते . वाजपेयी-अडवाणींच्या काळात सत्ता मिळूनही हिंदुत्वाच्या दिशेने अपेक्षित वाटचाल झाली नव्हती. त्याची पुनरावृत्ती संघाला होवू द्यायची नव्हती.कॉंग्रेस विजयाचा धोका पत्करूनही संघाने नरेंद्र मोदींच्या हाती भाजपची धुरा दिली ती याच मुळे. तसेही संघाला कॉंग्रेसचे वावडे नाही. भाजपला जेव्हा लोकसभेच्या दोनच जागांवर विजय मिळाला होता तेव्हा संघाने कोणाच्या बाजूने मतदान केले होते हे काही लपून राहिलेले नाही. मोदींमुळे विजय मिळाला नाही तरी भाजपच्या हिंदुत्वाला धार येईल याची संघाला खात्री आहे. येत्या निवडणुकीत लोकांनी मोदीला विकास पुरुष म्हणून मानले काय किंवा कट्टर हिंदुत्ववादी म्हणून संबोधले काय दोन्हीही स्थितीत संघ उद्दिष्टपूर्तीच्या जवळ जाणार आहे . मोदी किंवा भाजप जिंको अथवा हारो संघ मात्र जिंकणारच अशी ही संघाची अफलातून खेळी आहे.

Tuesday, 18 June 2013

तरुण आणि राजकारण

तरुण आणि राजकारण...!!


देशाच्या एकूणच जडणघडणीत आणि विकासात तरुणांचे योगदान महत्त्वपूर्ण असते. देशाच्या सामाजिक, सार्वजनिक आणि राजकीय जीवनाबद्दल, घटनेबद्दल तरुणांचे काय मत आहे, हे जाणून घेण्याची प्रत्येकाची इच्छा असते. समकालीन व्यामिश्र पेचप्रसंगात देशात बदल किंवा क्रांती घडवून आणण्याचे काम तरुणच करू शकतो यावर नागरी समाजाचा विश्वास असतो. अनेक देशांतील क्रांतीमधील सहभाग, स्वातंत्र्य आंदोलनातील आणि स्वातंत्र्योत्तर काळातील अनेक सामाजिक चळवळीतील सक्रिय सहभागातून तरुणांनी आपली कार्यक्षमता दाखवून दिली आहे. अलीकडले उदाहरण म्हणजे अण्णा हजारेंच्या भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलनात तरुणांचा सक्रिय सहभाग दिसून आला. फेसबुकवरून अण्णांचे आंदोलन तरुणांनीच चालवले. तरुण वर्ग आज भूमिका घेण्याच्या मनःस्थितीत दिसतो आहे. देशातील भ्रष्ट प्रवृत्तीविरुद्ध आवाज उठविणार्‍या अराजकीय नेतृत्वाकडे जसा तो आकर्षित होतो, तसाच तो नव्याने राजकारणात येणार्‍या नेतृत्वाकडेदेखील आकर्षित होताना दिसतो. आयटी क्षेत्रातील तरुण-तरुणी राहुल गांधींचा फोटो कॉम्प्युटर स्क्रीनवर ठेवताना दिसतात, तर स्पर्धा परीक्षेतील अनेक तरुण किरण बेदी, विश्वास नांगरे-पाटील, महेश भागवत, टी. चंद्रशेखर इ. प्रमाणेच राहुल गांधींनाही आयडॉल मानतात. उत्तर प्रदेशात राहुल बरोबरच आता अखिलेश यादवांकडे तरुण आकर्षित झालेले दिसतात. तर महाराष्ट्रात ‘लेक वाचवा’ अभियानातून सुप्रिया सुळे घराघरात पोहोचताना दिसते. जशी गर्दी राहुलच्या प्रचार सभांना होते तशीच गर्दी महाराष्ट्रात राज ठाकरेंच्या सभांना होताना दिसते. प्रचारसभा, त्याचे नियोजन, विविध आंदोलनातील तरुणांचा सहभाग जसा वाढू लागला तसा तो मतदानासाठीदेखील बाहेर पडू लागला. राजकारण भ्रष्ट झाले आहे आणि त्यात सुधारणा झाल्या पाहिजेत हे तरुणांना मान्य आहे. परंतु भ्रष्ट राजकारणाचे निर्मुलन स्वतः राजकारणात उतरून करणे तरुणांना मान्य नाही. तो स्वतः सक्रियपणे राजकारणात उतरताना दिसत नाही. राजकारणाकडे करिअर, एक व्यवसाय म्हणून पाहताना तो दिसत नाही. हे दिसून आले आहे सीएसडीएसच्या देशव्यापी अभ्यासातून.

तरुणांच्या राजकीय मतांचा अभ्यास
दिल्लीच्या सीएसडीएस- लोकनीती संशोधन टीमने तरुणांच्या राजकीय मतांचा मागील वर्षी अभ्यास केला. त्यासाठी नमुना निवड पद्धतीने देशभरातील तरुणांच्या मतांचे सर्वेक्षण करण्यात आले. शहरी-ग्रामीण, तरुण-तरुणी आणि सर्व जात-धर्म-वर्गाचे पुरेसे प्रतिनिधित्व समाविष्ट करून तरुणांची सर्वव्यापक मते नोंदवण्याचा प्रयत्न अभ्यासगटाने केला. तरुणांचा अभ्यास करताना अभ्यास गटाने तरुणांची व्याख्या निश्चित केली. ‘तरुण’ म्हणजे कोण? विचाराने, मनाने की वयाने तरुण? कोणत्याही वयात सार्वजनिक जीवनात सक्रिय असणार्‍या व्यक्तीस विचाराने किंवा मनाने तरुण व्यक्ती अशी व्यापक व्याख्या तरुणांची केली जाते. परंतु या अभ्यासात वयाचा विचार केला आहे. सर्वसाधारणतः १३ ते ३५ वयोगटातील मुला-मुलींना तरुण-तरुणी म्हटले जाते. संविधानात्मकदृष्ट्या १८ वर्षे पूर्ण करणार्‍या तरुण-तरुणींना मतदानाचा हक्क दिला आहे. त्यामुळे अभ्यासामध्ये १८ ते ३३ वर्षे वयोगट निवडला आहे. या वयोगटातील तरुणांचा वर्गही दोन भागांमध्ये विभागला जातो. एक १८ ते २५ वयातील तर दुसरा २६ ते ३३ वयोगटातील तरुण होय. या दुसर्‍या गटातील तरुणांचं मत हे पहिल्या वयोगटापेक्षा वेगळं असतं. अभ्यासात तरुण नेतृत्वाच्या व्याख्येत मात्र २५ ते ४० वयोगटातील व्यक्तींचा समावेश केला आहे. २०११ च्या जनगणनेनुसार भारतातील तरुणांची संख्या एकूण लोकसंख्येच्या १/५ आहे. २०२० पर्यंत भारताचे सरासरी वय २९ वर्षे होईल. त्यामुळे तरुणांच्या अभ्यासाचे वेगळेच महत्त्व आहे.
तरुणांचा अभ्यास करण्यामागे उद्देश असा होता की सध्याचा तरुण आणि इतर वर्ग राजकीय घडामोडींबाबत किती जागरूक आहेत, ते राजकीय स्वरूपाची चर्चा किती करतात, राजकीय सहभाग आणि राजकीय आवडी कशा आहेत, निवडणूक प्रक्रियेमध्ये त्यांचा स्वाभाविक कल कोणाकडे असतो, राजकारणाचा करिअर म्हणून तरुण कसा विचार करतो इत्यादी गोष्टी जाणून घेणे. अनेक घटकांआधारे तरुणांच्या राजकीय मतांचा अभ्यास करण्यात आला. त्यातील राजकीय जागृतता, राजकीय आवड, राजकीय सहभाग, पक्ष पसंती, निवडणूक सुधारणा आणि राजकीय करिअर या सहा घटकांबाबत तरुणांचे काय मत आहे याचा आपण इथे विचार करू.

राजकीय जागृती-
राजकारण, राजकीय घटनांबाबत तरुण किती जागरूक आहेत किंवा राजकीय घटनांबाबत किती माहिती ठेवतात हे जाणून घेण्याचा प्रयत्न केल्यास असे आढळून आले की, ३१ टक्के तरुण राजकीय दृष्ट्या जागृत नाहीत. ६९ टक्के तरुण राजकारणासंदर्भात जागृत आढळून आले. त्या ६९ टक्के तरुणांपैकी २० टक्के तरुण अधिक जागृत तर ४९ टक्के तरुण राजकारणासंदर्भात मर्यादित प्रमाणात माहिती बाळगतात तर केवळ १५% जुन्या लोकांमध्ये राजकारणाबाबत अधिक जनजागृती दिसते. १८ ते २५ वयोगटातील २३ टक्के तरुणांमध्ये अधिक राजकीय जागृतता दिसते तर २६ ते ३३ वयोगटामध्ये १८ टक्के तरुण राजकीय घडामोडींबाबत सजग असतात. यातून वयोगटातील जागृततेची वाढ आणि घट स्पष्ट दिसते. राजकीयदृष्ट्या ग्रामीण भागातील तरुणांपेक्षा शहरी तरुण अधिक सजग दिसतात. तरुण-तरुणींचा विचार केला तर तरुणींच्या तुलनेत तरुण अधिक जागृत दिसतात. ग्रामीण तरुणींच्या तुलनेत शहरी तरुणी अधिक सजग दिसते. सामान्यतः शहरी मध्यम आणि उच्च स्तरातील महिला राजकारणात सक्रिय दिसतात. शिक्षण व प्रसारमाध्यमांमुळे महिलांची मते आता व्यक्त होऊ लागली आहेत. परंतु त्या राजकीय जगाला आव्हान करताना दिसत नाहीत.

राजकीय आवड आणि सहभाग-
राजकारणाबाबतच्या आवडीसंदर्भात असे दिसून आले की ६२ टक्के तरुणांना राजकारणाची आवड आहे. त्यातील १० टक्के तरुणांना राजकारणाची अधिक आवड दिसून आली. ३४ टक्के तरुणांनी राजकारणाबाबत उत्साह दर्शवला नाही. ७६ टक्के तरुण पुरुष राजकारणात रस घेताना दिसतात तर ४५ टक्के तरुण स्त्रिया राजकारणात रस घेताना आढळून आल्या. यामध्ये शिक्षण आणि प्रसारमाध्यमेदेखील दोघांचा रेशो बरोबर करू शकत नाहीत. ७८ टक्के उच्चशिक्षित तरुण राजकारणात सहभाग घ्यायला उत्सुक आहेत तर निरक्षरांमध्ये ३५ टक्के तरुण राजकीय सहभागाबाबत उत्सुक आहेत. शिक्षणामुळे लोक राजकारणाकडे सकारात्मकदृष्ट्या पाहताना दिसतात. राजकारणात आवड असणार्‍या तरुणांचे प्रमाण अधिक दिसत असले तरी राजकारणात सहभाग घेणार्‍या तरुणांचे प्रमाण मात्र कमी दिसून आले.
राजकीय सहभाग तीन पातळ्यांवर मोजण्याचा प्रयत्न प्रस्तुत अभ्यासात करण्यात आला. एक म्हणजे मतदान प्रक्रियेतील सहभाग. १८ ते ३३ वयोगटातील तरुणांच्या मतदानाची टक्केवारी १९९६ ते २००९ सालच्या निवडणुकीदरम्यान ५८ टक्क्यांच्या मागेपुढे राहिलेली दिसते. त्यात तरुणांच्या तुलनेत तरुणींचे प्रमाण कमी दिसते. शिवाय शहरी तरुणांच्या मतदानाच्या तुलनेत ग्रामीण तरुणांचे मतदानात भाग घेण्याचे प्रमाण अधिक दिसते. राजकीय सहभागाची दुसरी पातळी म्हणजे निवडणूक संदर्भातील प्रक्रियामधील म्हणजेच पक्षाचे मेळावे-बैठका, प्रचारसभा, पत्रकं वाटप इत्यादींमधील सहभाग मोजण्याचा प्रयत्न सर्वेक्षणात करण्यात आला. या प्रक्रियेमध्ये सहभाग घेणार्‍यांचे प्रमाण कमी आढळून आले. निवडणूकसंबंधित कामांमध्ये शहरी तरुणांच्या तुलनेत ग्रामीण तरुण अधिक सहभाग घेताना आढळतात. तिसरी पातळी म्हणजे निषेध-निदर्शने मोर्चातील सहभाग तपासणे. सर्वेक्षणात आढळून आले, की केवळ १२ टक्के तरुण निषेध-निदर्शनात सहभाग घेतात. इतर म्हणजे ३४ वयोगटानंतरच्या लोकांमध्ये हे प्रमाण ११ टक्के दिसते. म्हणजे तरुण व इतरात या बाबतीत फरक नाही. शहरी तरुणांच्या तुलनेत ग्रामीण तरुण निषेध मोर्चात अधिक सहभाग घेताना दिसतात तर याउलट ग्रामीण तरुणींच्या तुलनेत शहरी तरुणी या कामात अधिक सक्रिय दिसून आल्या. राजकीय सहभागाच्या तिन्ही पातळ्यांचा विचार करता हे स्पष्ट होते की राजकारणाविषयीची आवड असणे वेगळे आणि त्यात प्रत्यक्ष सहभाग घेणे वेगळे आहे. या दोन्ही भिन्न गोष्टी आहेत.

राजकीय कल-
तरुणांचे मत प्रत्येक राजकीय पक्षाला महत्त्वाचे वाटते आणि ते मिळवण्यासाठी प्रयत्न केले जातात. या सर्वेक्षणात तरुणांचा राजकीय कल जाणून घेण्याचा प्रयत्न केला. तरुणांचा मतदानाचा पॅटर्न बदलताना दिसतो. कॉंग्रेसमागे उभे राहणारा तरुण नव्वदच्या दशकानंतर कॉंग्रेसबरोबर इतर पक्षांत विभागलेला दिसतो. कॉंग्रेसचा तरुण पाठीराखा कमी होण्यामागे भाजपचा व काही प्रादेशिक पक्षाचा उदय दिसतो. तरीही भाजपच्या तुलनेत कॉंग्रेसला मतं देणार्‍या तरुणांचे प्रमाण अधिक दिसते. विशेषतः २००४ व २००९ सालच्या लोकसभा निवडणुकीत तरुणांचा कॉंग्रेसला अधिक पाठिंबा दिसतो, पण भाजपला मिळणार्‍या वरिष्ठ मतदारांच्या तुलनेत भाजपला तरुणांची अधिक मते मिळताना दिसतात. १९९८ व १९९९ सालच्या लोकसभा निवडणुकीनंतर भाजप सत्तेवर आला. या दोन्ही निवडणुकांत कॉंग्रेसपेक्षा तरुणांनी भाजपला अधिक मते दिलेली दिसतात. तरुणांना (विशेषतः विद्यापीठीय पातळीवरील) डाच्या विचारांचे आकर्षण असते. परंतु ते मतांमध्ये परिवर्तित होताना दितस नाहीत. उत्तरेकडील दलित तरुणांचा कल बसपाकडे दिसतो. तरुणांच्या तुलनेत तरुणींची मते कॉंग्रेसला अधिक मिळताना दिसतात. शहरी तरुणांचा कल भाजपकडे तर ग्रामीण तरुणांचा कल कॉंग्रेसकडे दिसतो.

निवडणूक सुधारणा-
या सर्वेक्षणात निवडणूक सुधारणासंदर्भात तरुणांमध्ये एकमत आढळून आले. निवडणूक पद्धतीमध्ये काही दोष असल्याने अनेक प्रश्न निर्माण झाले. निवडणूक सुधारणासंदर्भात अनेक आयोगांचे अहवालही आले. अण्णा हजारेंच्या आंदोलनादरम्यानही निवडणूक सुधारणासंबंधी चर्चा झाली, या सर्वेक्षणात निवडणूक सुधारणासंदर्भात लोकप्रतिनिधींना परत बोलावण्याचा हक्क, सक्तीचे मतदान, उमेदवार नाकारण्याचा अधिकार आणि ६५ वर्षांवरील उमेदवारास निवडणूक लढवण्यापासून निर्बंध घालण्यासंदर्भातील मुद्द्यांचा समावेश होता. जनतेने पाच वर्षांसाठी निवडून दिलेला खासदार किंवा आमदार जनतेप्रती जबाबदार राहिला नसेल किंवा समाधानकारक कामगिरी नसेल तर त्याला मुदत संपण्याआधी परत बोलावण्यास (Right to Recall) ६९ टक्के तरुणांनी संमती दर्शवली आहे. मतदानाचे घटते प्रमाण लक्षात घेता सक्तीच्या मतदानाची चर्चा नेहमीच होते. या प्रश्नांसंदर्भात ६० टक्के तरुण सक्तीच्या मतदानाचे समर्थन करताना दिसतात. नको असलेला उमेदवार नाकारण्यासंदर्भात (Right ti Reject) ६० टक्के तरुण होकार देताना दिसतात. तर ६५ वर्षांपुढील उमेदवारांवर निवडणूक लढवण्यास निर्बंध घालण्यासंदर्भात ५० टक्के तरुण संमत दिसतात. निवडणूक सुधारणांच्या मुद्द्यांंसंदर्भात तरुणांप्रमाणेच ज्येष्ठांचाही मोठा पाठिंबा दिसतो. निवडणूक सुधारणांना कनिष्ठ व गरीब वर्गाच्या तुलनेत उच्च व मध्यम वर्गातील तरुणांचा अधिक पाठिंबा दिसून आला. पक्षीय पाठीराख्यांचा विचार केला तर कॉंग्रेसच्या पाठिराख्यांच्या तुलनेत डावे पक्ष व भाजपाचे समर्थक असलेले तरुण निवडणूक सुधारणांना अधिक पाठिंबा देताना दिसतात.
राजकारणात करिअर करण्यासंदर्भात ५४ टक्के तरुणांनी नकारार्थी उत्तर दिले तर ३४ टक्के तरुणांनी राजकारणात करिअर करण्याची इच्छा दर्शवली. ग्रामीण तरुण-तरुणींच्या तुलनेत शहरी तरुण-तरुणी अधिक इच्छुक दिसतात तर राजकारणात करिअर करू इच्छिणार्‍यात मध्यम वर्गातील युवकांचे प्रमाण अधिक दिसते. राजकारणाकडे करिअर म्हणून न पाहण्यामागे सर्वात मोठा अडथळा घराणेशाहीचा आहे. १५ व्या लोकसभेत निवडून आलेल्या तरुण खासदारात ६६ टक्के खासदारांना राजकीय पार्श्वभूमी आहे. हीच अवस्था महाराष्ट्रातील तरुण आमदारांबाबत दिसून येते. घराणेशाहीमुळे नवीन नेतृत्वास संधी मिळताना दिसत नाही.

तरुणांच्या अभ्यासावरून स्पष्ट होते की राजकारणाबाबतची तरुणांतील सजगता वाढत आहे, राजकारणाविषयी तरुणांना मोठ्या प्रमाणात आवड आहे. परंतु जबाबदारी घेण्यास युवक तयार नाहीत. राजकारणात बदल झाले पाहिजेत, निवडणूक पद्धतीत सुधारणा झाल्या पाहिजेत, पण स्वतः त्यात सहभाग घ्यायचा नाही, राजकारणाकडे 8करिअरचा एक पर्याय म्हणून पाहण्याची त्यांची तयारी नाही. हा विरोधाभास लोकशाहीस धोक्याचा असून तरुणातील हा दृष्टिकोन बदलण्याची आवश्यकता आहे.

Friday, 7 June 2013

राजकारणात रचनात्मक काम केल्यास स्त्रियांना मोठी संधी !

राजकारणात रचनात्मक काम केल्यास स्त्रियांना मोठी संधी !

 (भारताचाच नव्हे तर जगाचा विचार केला तरी राजकारणात महिलांचा मोठा प्रभाव पडल्याची उदाहरणे आहेत. महिला पुरुषांपेक्षा कुठल्याही बाबतीत कमी नाहीत. ब्रिटन, श्रीलंका, पाकिस्तान या देशांमध्ये महिलांनी देशाचे नेतृत्व केलेले आहे. म्यानमारच्या नेत्या ऑग सॉन स्यू की यांनी 25 वर्षाहून अधिक काळ देशाच्या लष्करी सत्तेशी लढा दिला. इंदिरा गांधींचे उदाहरण देशवासियांना माहिती आहेच.)

पंढरी प्रहारने आपल्या दिवाळी अंकासाठी विविध विषयांची निवड केली. राजकारणातील स्त्री या विषयावर संपादकांनी मतप्रदर्शन करण्यास सांगितले. माझ्या मते दिवाळी अंक हे केवळ कथा - कविता, विनोदी लेख यासाठी वाचले न जाता विविध विचार प्रकट करणार्‍या साहित्यासाठी वाचले जावेत हे योग्य. मराठी भाषा समृध्दीच्या एका टप्यावर आहे. स्पर्धेच्या जगात मराठी भाषेची पीछेहाट होते आहे, अशा स्वरुपाची चर्चा केली जाते. पण माझ्या मते मराठी भाषा ही चंद्र - सूर्य तारे आहेत तोपर्यंत राहणार आहे.

आता संपादकांनी सांगितलेल्या विषयाकडे वळू या. राजकारणातील स्त्री हा विषय त्यांनी दिला आहे. मी महाराष्ट्राच्या सामाजिक क्षेत्रात सुमारे 40 वर्षे काम करते आहे. पण सत्ता हे मी साध्य मानलेले नाही, तर ते एक साधन आहे. समाजाचे बहुतेक सगळे प्रश्न सरकार नावाच्या संस्थेशी निगडीत असतात. सरकार जे निर्णय घेते त्याचे परिणाम समाजावर होत असतात. प्रत्यक्ष परिणामांपेक्षाही अप्रत्यक्ष परिणाम दूरगामी स्वरुपाच असतात. हे परिणाम पुरुषवर्गापेक्षा महिला वर्गास अधिक प्रमाणात भोगावे लागतात. भारतीय स्त्री सोशीक असते असे म्हटले जात, पण ती एकाकी असते तेव्हा तिला अन्य पर्यायच असत नाही. अशिक्षितपणामुळे हक्कांची जाणीवच नसते. त्यामुळे हक्कासांठी झगडण्याचा प्रश्नच उद्भवत नाही. महिलांना हक्कांची जाणीव करुन देणे हेच काम आधी मोठ्या जिकिरीचे असत. पण एकदा महिला जागृत झाली की ती अन्यायाविरुध्द संघर्ष करतेच, पण एकंदर सामाजिक विकासातही महत्वाची भूमिका बजावते.

मी प्रारंभी म्हटले तसे राजकारण हे साध्य नव्हे, तसे सत्ता हे देखील साध्य नव्हे, पण राजकारण करणार्‍या राजकीय पक्षांनी सत्ता प्राप्त कुन सामाजिक आणि राजकीय विकास साधावयाचा असतो. सत्ता संपादन करण्यासाठी निवडणूक लढविणे ही अपरिहार्य गोष्ट असते. निवडणूक लढविण्यासाठी मानसिक धैर्य हवे असते. शिक्षण हे राजकीय नेतृत्वास अपरिहार्य नाही, त्यामुळे कोणासही राजकीय क्षेत्रामध्ये उतरता येते, पण राजकारण हा व्यवसाय मानला तर अन्य कुणाचेही प्रश्न सुटणार नाहीत; फक्त त्या व्यक्तीचे स्वत:चे जे काही प्रश्न असतील ते सुटल्यासारखे वाटतील. प्रत्यक्षात यामुळे जनकल्याण किती होईल हेही पाहणे महत्वाचे आहे.

भारताचाच नव्हे तर जगाचा विचार केला तरी राजकारणात महिलांचा मोठा प्रभाव पडल्याची उदाहरणे आहेत. महिला पुरुषांपेक्षा कुठल्याही बाबतीत कमी नाहीत. ब्रिटन, श्रीलंका, पाकिस्तान या देशांमध्ये महिलांनी देशाचे नेतृत्व केलेले आहे. म्यानमारच्या नेत्या ऑग सॉन स्यू की यांनी 25 वर्षाहून अधिक काळ देशाच्या लष्करी सत्तेशी लढा दिला. इंदिरा गांधींचे उदाहरण देशवासियांना माहिती आहेच. आज भारतात ममता बॅनर्जी, जयललिता, शीला दीक्षित या महिला मुख्यमंत्रीपद सांभाळित आहेत. दिवंगत नंदिनी सत्पथी यांनी ओरीसाचे मुख्यमंत्रीपद सांभाळले होते. तर बिहारमध्ये लालूंच्या आशीवार्दामुळे त्यांच्या पत्नी राबडीदेवी स्वयंपाकघरातून थेट मुख्यमंत्रीपदाच्या खूर्चीपर्यंत पोहोचल्याचेही लोकांनी पाहिले. उमा भारती, वसुंधराराजे यांची मुख्यमंत्रीपदाची कारकीर्द लोकांनी पाहिली; तर देशाच्या पहिल्या राष्ट्रपती म्हणून महाराष्ट्राच्या प्रतिभाताई पाटील यांना संधी मिळाल्याने महाराष्ट्रीय जनतेची मान उंचावली.

आपापल्या शक्तीनुसार महिलांनी राजकारणात उत्तम कामगिरी बजावलेली आहे, पण पुरुषप्रधान संस्कृतीत महिलांना पुढे यरण्यासाठी काव्या लागणार्‍या संघर्षात त्यांची मोठी शक्ती खर्च होते. पण ज्यांना संघर्ष करायचा आहे, त्या महिलांना कोणी रोखू शकत नाही, अनंत अडचणी असतात. पहिली गोष्ट म्हणजे महिलांना संसार आणि राजकारण याचा ताळमेळ बसवावा लागतो. राजकारणात सक्रीय काम करण्याचा विचार जरी मनात आला तरी पहिला विरोध घरातूनच होतो. अपवाद राजकीय क्षेत्रात स्थापित झालेल्या घराण्यांचा म्हणता येईल. पण या घाण्यांमधूनही स्त्रीया मोठ्या संख्येने राजकारणात आल्याची उदाहरणे कमीच आहेत. उलट अनेक स्त्रियांना त्यांच्या आवडीच्याक्षेत्रात काम करण्यासाठी पहिले बंड उंबरठ्याच्या आतच करावे लागते.

चित्रपटांमध्ये राजकारणी स्त्रीची प्रतिमा काल्पनिक पद्धतीने रंगविली जाते. त्या पद्धतीची प्रतिमा पडद्यावर अभिनेत्रीने वठविली तरी वास्तव काय आहे हा प्रश्न उरतोच. शेवटी राजकारण कशासाठी करायचे याचे उत्तर देणे सोपे नाही. पण समाजातील अन्याय, अत्याचार दूर व्हावेत आणि सामाजिक सौख्य नांदावे ही प्रमाणिक भूमिका असते. पण ही भूमिकाही समाज सहजासहजी स्वीकारत नाही. वर म्हटलं तसं राजकारणात काम करणार्‍या स्त्रियांना पहिला विरोध उंबरठ्याच्या आत होतो, आणि उंबरठ्याच्या बाहेर पाऊल ठेवल्याबरोबर प्रत्येक पावलावर हा विरोध सहन करावा लागतो. माझा स्वत:चा अनुभव सांगते, वैद्यकीय श्रेत्रात पदवी मिळविल्यानंतर काही वर्षे मी प्रॅक्टीस केली. दवाखाना चालवावा, तो वाढवावा पुढे त्याचे हॉस्पीटलमध्ये रुपांतर करावे आणि छान आयुष्य जगावे असे स्वप्न (राजकारण आणि समाजकारण याची बर्‍याचदा गल्लत होते. पण या दोन्ही बाबी एकमेकांना पूरक अशा आहेत. राजकारणामुळे जे व्यासपीठ उपलब्ध होते तिथे स्त्रियांना केवळ स्त्रियांचेच नव्हे तर संपूर्ण समाजाचे प्रश्न मांडण्याची संधी प्राप्त होते. मात्र त्याचा उपयोग स्त्रिया कशाप्रकारे करुन घेतात आणि राजकीय पक्ष त्यांना तशी संधी किती देतात यावरही बरेच काही अवलंबून आहे.) बाळगण्याचा तो काळ होता; म्हणजे 1975 चा सुमार असेल. पण महाविद्यालयीन जीवनाच्या आधीपासूनच समाजाशी माझी कुठेतरी जवळीक आहे हे समजल्यानंतर नियतीने आपल्याकडे हे काम सोपविले आहे याची जाणीव झाली आणि कुठलाही कामात झोकून देण्याची सवय आणि आपण हाताळत असलेल्या विषयात असलेला प्रामाणिकपणा आणि पोटतिडीक यामुळे अनेक विषय हाताळून त्याची तड लावण्याचे काम करता आले; ही आनंदाची गोष्ट आहे. पण काम करण्याची इच्छा झगडून मिळवावी लागते. प्रयत्न करावेच लागतात. ही संधी सहजासहजी चालून येत नाही. राजकारणातले यश म्हणजे काय याचीही प्रत्येकाची व्याख्या वेगळी आहे. आपल्या आवाक्यात असणारी खुर्ची पटकावणे आणि त्या खुर्चीवर बसून कामाचा आनंद अनुभवणे हे माझ्या दृष्टीने यश नव्हे. कारण समाजाचे प्रश्न संपणारे नाहीत, उलट काळाबरोबर त्या प्रश्नांचा गुंता वाढत जातो. प्रत्येक टप्प्यावर प्रश्न सोडविण्याचे प्रयत्न करताना एका प्रश्नातून दुसरा प्रश्नही तयार होत असतो. त्यामुळे लढण्याची ही प्रक्रिया सतत चालणारी असते.

राजकारण सत्तेसाठीच असते. त्यामुळे अथक परिश्रम करुनही जेव्हा अपेक्षित यश मिळत नाही तेव्हा अनेकांना, विशेषत: स्त्रियांना, वैफल्यकिंवा निराशा येण्याची मोठी शक्यता असते. राजकारणातील यश किंवा अपयश हे मुख्यत: निवडणुकीतील यशापयशावरुनच ठरवले जाते. निवडणुकीतील पराभव हा अनेक वर्षे मागे खेचणारा असतो. पण अपयशातून पुन्हा उभे रहायचे असते. स्त्रियांच्या बाबतीत ही बाब अधिक प्रकर्षाने समोर येते.

राजकारण आणि समाजकारण याची बर्‍याचदा गल्लत होते. पण या दोन्ही बाबी एकमेकांना पूरक अशा आहेत. राजकारणामुळे जे व्यासपीठ उपलब्ध होते तिथे स्त्रियांना केवळ स्त्रियांचेच नव्हे तर संपूर्ण समाजाचे प्रश्न मांडण्याची संधी प्राप्त होते. मात्र त्याचा उपयोग स्त्रिया कशाप्रकारे करुन घेतात आणि राजकीय पक्ष त्यांना तशी संधी किती देतात यावरही बरेच काही अवलंबून आहे.

मझ्या सुदैवाने शिवसेनेची विधानपरिषद सदस्या या नात्याने गेली 10 वर्षे कामाची संधी मिळाली. ही संधी मिळण्याआधीही मी शिवसेनेचे संघटनात्मक काम केले. या कामासाठी शिवसेना कार्याध्याक्ष उद्धव ठाकरे यांचे मार्गदर्शन आणि हिंदुहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख श्री.बाळासाहेब ठाकरे यांचे आशीर्वाद हे माझे मोठे बळ ठरले. त्यापूर्वी महाविद्यालयघीन रजघीवनापासून मी सामाजिक प्रश्नांसाठी संघर्ष करीत असताना राजकारणाचाही एक भाग होतेच. पण अत्यंत कठीण आणि संवेदनशील असे प्रश्न हाताळताना हा आशीर्वाद आणि मार्गदर्शन महत्वाचे ठरते.

याबाबत मी नगर जिल्ह्यात कोठेवाडी येथे झालेल्या भयंकर अत्याचारांचे उदाहरण देईन. माणूसकीला काळिमा फासणारी ती घटना महाराष्ट्राच्या सामाजिक जीवनाच्या दृष्टीने एक कलंक होती. ग्रामीण भागात दुर्गम ठिकाणी घडलेल्या या घटनेनंतर त्याची तड लावणे, ज्या स्त्रियांवर अत्याचार झाले त्यांना बोलते करणे, त्यांच्या पाठिशी ताकद उभी करणे, न्यायालयीन लढाई लढणे हे सोपे नव्हते. पण राजकारणात काम करणार्‍या कोणत्याही स्त्रीच्या पाठीशी जर योग्य ते पाठबळ उभे राहिले तर लढण्याचे बळ आणखी वाढते. पण त्यानंतरही समस्या आणि विरोधाचे अडथळे प्रत्येक वाटचालीत उभे असतात. अत्याचारीत स्त्रीला न्याय मिळेपर्यंत अनेकदा तिचे समाजाकडून धिंडवडे निघतात आणि तिला न्याय देण्यासाठी झटणार्‍या स्त्रियांची मोठी दमछाक होण्याचीही भीती असते. गेली 20 वर्षे शिवसेनेची महिला आघाडी कार्यरत आहे. पण महिलांना काम करण्याची खूप मोठी संधी यापुढील काळात आहे; हे मी जाणीवपूर्वक नमूद करते. शिवसेनेच्या कुठल्याही कार्यक्रमात स्त्रियांची संख्या लक्षणीय असते; याचे कारण शिवसेनाप्रमुखांचे आश्वासक नेतृत्व.महाराष्ट्रातील स्त्रियांना शिवसेनेचा मोठा आधार वाटतो याचे कारण शिवसेनेची रोखठोक आणि स्पष्ट भूमिका हेच आहे. मी 1998 सालापासून शिवसेनेत काम करायला प्रारंभ केल्यास आता 14 वर्षे होतील. मला राजकीय, सामाजिक आणि वैचारिक सुरक्षितता याच ठिकाणी जाणवली हेही नमूद करावयाचे आहे.

राजकारणात स्त्रियांनी का करीत असताना धाडस अंगी बाणवणे आवश्यक आहेच, पण त्याचबरोबर सामाजिक प्रश्नांचा नियमितपणे अभ्यास करणेही आवश्यक आहे. कोणत्याही (घराचे अर्थकारण स्त्री सांभाळते तेव्हा तिचा दृष्टीकोन बचतीचाच असतो. स्त्रीयांकडे स्थायी समिती, अर्थ समिती अशी सभापतीपदे आली आणि तिने ठरविले तर वायफळ खर्चावर तिला सक्तीने नियंत्रण मिळविणे सहज शक्य आहे. त्याचबरोबर सरपंच, महापौर, नगराध्यक्ष अशा विविध पदांवर काम करताना स्त्रियांना आपला प्रभाव दाखविणेही शक्य आहे.) प्रश्नावर आवाज उठविल्यानंतर त्यास कोणी प्रतिकार केल्यास आपण निरुत्तर न होता प्रतिवाद करण्यासाठी हा अभ्यास उपयुक्त ठरतो. अनेकदा एखादा प्रश्न सोडविण्यासाठी आक्रमक व्हावे लागते. राजकारणात काम करताना ही आक्रमकता अंगी बाणवायला शिकलेच पाहिजे.

आपणास मुद्दाम सांगते की, शिवसेना महिला आघाडीची स्थापना अशा गरजेतून झाली आहे. मुंबईत चेंबुर भागात स्त्रिया स्थानिक गुंडांना कंटाळल्या होत्या. त्या धाडसाने पुढे झाल्या व त्यांनी शिवसेना महिला आघाडीच्या स्थापनेची मागणी केली. तेथे महिलांची आघाडी स्थापन झाली. पुढे फक्त मुंबईत 227 शाखा स्थापन झाल्या. यातून काही महिला पुढे महानगरपालिकेवर निवडून आल्या. त्यांना काम करण्याची अत्यंत चांगली संधी प्राप्त झाली.

महाराष्ट्रात स्थानिक स्वराज्य संस्थांत स्त्रियांसाठी 50 टक्के आरक्षण आहे. पण शिवसेनेने आरक्षण नसलेल्या जागीही स्त्रियांना उमेदवारी दिलेली आहे. महत्वाचे म्हणजे अन्य पक्षातील स्त्री कार्यकर्त्या आणि शिवसेनेतील स्त्री कार्यकर्त्या यातला फरक लोकांना जाणवतो. आक्रमक असली तरी आश्वासक आणि विश्वासू ही शिवसेनेतील स्त्रियांची प्रतिमा ठळकपणे जाणवेल. याचे कारण शिवसेनेत येणार्‍या स्त्रिया सत्ता संपादन करण्याच्या हेतूने येण्याऐवजी काही सामाजिक कार्य हाती घेण्याच्या ईर्षेने येतात. शिनसेनेत अनेक स्त्रिया रोज किमान 3-4 तास पक्षासाठीच काम करतात. शिवसेना 80 टक्के समाजकारण आणि 20 टक्के राजकारण करते. त्यामुळे सत्तेच्या पदांवर नजर ठेऊन येणार्‍यांचे प्रमाण कमी आहे एवढे नक्की.

आरक्षणामुळे स्त्रियांना काम करण्याची संधी प्राप्त झालेली आहे. एक बाब नक्की आहे की अर्थकारण स्त्रीच्या हाती असणे हे अधिक चांगले. घराचे अर्थकारण स्त्री सांभाळते तेव्हा तिचा दृष्टीकोन बचतीचाच असतो. स्त्रीयांकडे स्थायी समिती, अर्थ समिती अशीसभापतीपदे आली आणि तिने ठरविले तर वायफळ खर्चावर तिला सक्तीने नियंत्रण मिळविणे सहज शक्य आहे. त्याचबरोबर सरपंच, महापौर, नगराध्यक्ष अशा विविध पदांवर काम करताना स्त्रियांना आपला प्रभाव दाखविणेही शक्य आहे. पण त्यासाठी निर्धार हवा. अन्यथा सत्तेच्या पदावर स्त्री आणि कारभार पहाणारा तिचा पती अशी परिस्थिती निर्माण होऊ शकते. पण कोणत्याही संस्थेत प्रतिनिधी म्हणूननिवडून गेल्यानंतर आवश्यक तेवढा वेळ त्या कामासाठी देण्याने बरेच काही साध्य करता येईल, असे मला वाटते.

प्रारंभी उल्लेख केल्याप्रमाणे राजकारणात स्त्रियांना टोकाची टीका सहन करावी लागते. पण त्यालाही खंबीरपणे तोंड देण्याची तयारी हवी. हल्ली विविध चॅनेलवरुन होणार्‍या विषयांवरच्या चर्चेत सहभागी होण्याची संधी मला मिळाली. तशी अनेक स्त्रीयांना मिळालेली आहे. इथे अगदी थोड्या वेळात आपली भूमिका मांडायची असते. पण बर्‍याच वेळा आपले विचार न पटणारे वक्तेही या र्चेत सहभागी होतात. उपरोधाने, आक्रमकपणे बोलून नामोहरम करण्याचाही प्रयत्न करणारे वक्ते व राजकीय नेते महाराष्ट्रात आहेत. पण त्यांना तिथल्या तिथे उत्तर देण्यास पर्याय असत नाही. अखेर ही लोकशाहीतली चर्चा असते. पण मी स्त्री आहे म्हणून माघार घेतली असे कदापि होता कामा नये.

स्त्री आणि पुरुष यांच्यात स्पर्धा असतेच. ती थोडी नैसर्गिक स्वरुपाचीही असते. मुख्यत: निसर्गाने पुरुषाला स्त्रीपेक्षा शारीरिकदृष्ट्या अधिक ताकदवान बनविलेले असले तरी स्त्री हे शक्तीचे प्रतिक आहे. ही शक्ती योग्य प्रकारे वापरली तर स्त्री कुठेही कमी नाही. राजकारणात तर मुळीच नाही. म्हणून वर्तमान स्त्रीचे आहे, भविष्यात स्त्रियांना चांगली संधी आहे, त्यांच्या कामाची गरज आहे, त्यामुळेच राष्ट्रहित आणि विकासाला वचनबद्ध होऊन परिश्रम करुन सातत्याने कार्यरत रहावे.

एक महत्वाचा प्रश्न; ज्याकडे राजकीय क्षेत्रात काम करणार्‍या स्त्रियांनी लक्ष देणे गरजेचे आहे, तो म्हणजे अमाप स्वातंत्र्यामुळे निर्माण होत असलेल्या समस्या आणि भावी काळातील स्त्रियांची प्रतिमा. स्त्रिया पुरुषांच्या बरोबरीने प्रगती करीत आहेत हे खरे असले तरीही स्त्रियांनी पुरुषांच्या बरोबरीने किंवा त्यांच्यासह पबमध्ये जाणे, रेव्ह पार्टी करणे अशा स्वरुपाची नवी संस्कृती समाजात झपाट्याने फोफावते आहे. पबमधल्या पार्ट्यांवर धाडी पडतात तेव्हा अर्ध्यामुर्ध्या कपड्यात तोंड लपविणार्‍या मुलींची छायाचित्रे वृत्तपत्रात प्रकाशित होतात आणि या मुलींची छायाचित्रे घेण्यासाठी त्यांचा पाठलाग करणार्‍या छायाचित्रकारांचे फोटोही प्रकाशित होतात तेव्हा आपण कुठे चाललो आहोत याची कल्पना येते. प्रचंड शहरीकरण आणि समाजाच्या काही वर्गांकडे आलेल्या प्रचंड पैशाचे हे परिणाम आहेत. पण ते आता एका वर्गापुरते मर्यादित न राहता समाजाच्या सर्वच आर्थिक स्तरांपर्यंत पोहोचत आहेत. पोलिसी कारवाई हा कायदेशीर व तात्पुरता उपाय झाला! पण समाजात पसरत असलेले हे विष रोखण्याची कामगिरी स्त्रियांना आणि विशेषत: राजकारणात असलेल्या स्त्रियांना करावयाची आहे. त्यामुळे राजकारणातल्या स्त्रीयांनी केवळ सत्तेच्या राजकारणाकडे न पाहता या अत्यंत गंभीर अशा सामाजिक प्रश्नांकडे पहावे. समाजाशी विशेषत: स्त्रियांशी संवाद वाढवायला हवा.

Tuesday, 4 June 2013

चीनचे पंतप्रधान ली कचियांग भारतभेट

चीनचे पंतप्रधान ली कचियांग भारतभेट

म्हशीचे मांस, सांडपाणी प्रक्रिया, शेतीसाठी जलबचत, पुस्तके प्रकाशनावर जोर
भारत भेटी नंतर चिनी पंतप्रधान आता पाकिस्तान भेटीवर आहेत.चीनच्या दक्षिण आशियातील परराष्ट्र धोरणात पाकिस्तानची भूमिका अत्यंत महत्त्वाची आहे. चीन-पाकिस्तानसोबतची अतूट मैत्री भारताने मान्य करावी. केवळ नवी दिल्लीची मर्जी राखण्यासाठी पाकिस्तानसोबतच्या संबंधात बाधा येणार नाही, असा इशारा चीनने दिला आहे. पंतप्रधान ली केकियांग यांच्या दौर्‍यावेळी (२२-२४ मे) पाकिस्तानने केलेल्या आदरातिथ्यामुळे चीन भारावला आहे. चीनचे सरकारी वृत्तपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ मध्ये केकियांग यांच्या पाकिस्तान दौर्‍यावर अग्रलेखामध्ये भाष्य करण्यात आले आहे. वृत्तपत्रांच्या माध्यमांतून चीन सरकार आपले मत अथवा धोरण बहुतांश वेळा प्रकट करीत असते. त्यामुळे तेथील सरकारी दैनिकांमधील मत सरकारचेच मत असते.

सीमाप्रश्‍न, चीनमधून भारतात वाहणार्‍या नद्या आणि द्विपक्षीय व्यापारी संबंधांमधील असमतोल दूर करून चिनी बाजारपेठ भारताला आणखी खुली करून देणे, या तिन्ही मुद्‌द्‌यांवर भारताने आज चीनकडून सहकार्याची अपेक्षा केली होती. पण ती विफ़ल झाली.चीनने पुढे केलेल्या प्रस्तावाबाबत भारताने फारशी अनुकूलता दाखविलेली नाही. भारताचे संरक्षणमंत्री ए. के. अँटनी यांच्या चीन दौर्‍याची यानिमित्त घोषणा करण्यात आली.चीनच्या दबावासमोर झुकून भारतीय सैन्यालाच बंकर तोडण्यास सांगणारे संरक्षणमंत्री अँथनी आता चीनला जाऊन अजून काय करतील.भारतीयांसमोर बढाई मारायची आणि चीनसमोर नांगी टाकायची ही भारतीय राज्यकर्त्यांची परंपरा आहे .चीनने दौलतबेग गोल्डी येथे सैन्य घुसलेच कसे ? त्याला हे धाडसच कसे होते ? भारतीय राज्यकर्त्यांमुळेच चीन अशी मग्रुरी करू शकतो. देशाला आज कणखर राज्यकर्त्यांची गरज आहे.सीमावादासंबंधीच्या यंत्रणेच्या पुढील बैठकीसाठी राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लागार शिवशंकर मेनन हेही लवकरच चीनला जाणार असल्याची माहिती या वेळी देण्यात आली.

आठ करारांवर शिक्कामोर्तब
पंतप्रधान ली यांची भेट अतिशय उपयुक्त झाली. तसेच, त्यातील फलनिष्पत्ती ठोस राहिली, असे भारताचे चीनमधील राजदूत जयशंकर यांनी पत्रकारांना सांगितले.भारत व चीनदरम्यान आज आठ करारांवर स्वाक्षर्‍या करण्यात आल्या. उपयुक्त करार म्हशीचे मांसावर प्रक्रिया, सांडपाणी प्रक्रिया, शेतीसाठी जलबचत, २५ पुस्तके प्रकाशन करणे, आर्थिक सहकार्य आहेत. हे विषय किती महत्वाचे आहेत?

- कैलास-मानस सरोवर यात्रा दर वर्षी मे ते सप्टेंबरमध्ये होते. यात्रेसाठी चीनकडून काही सुविधांमध्ये आणखी सुधारणा करणे. स्थानिक सिमकार्ड पुरविणे, वायरलेस सेट पुरविणे आदी.

- म्हशीचे मांस, मत्स्य उत्पादने आणि मत्स्यखाद्य व त्यातील अन्य घटकांची शुद्धता राखण्यासंदर्भातील नियामक यंत्रणेची निर्मिती.

- सांडपाणी प्रक्रिया आणि नागरी क्षेत्रातील परस्परहितविषयक अनुभवांची देवाणघेवाण.

- शेतीसाठी जलबचत किंवा पाण्याचा परिणामकारक वापर करण्यासंबंधीच्या तंत्रज्ञानाच्या क्षेत्रात सहकार्यविषयक करार.

- पाच वर्षांत दोन्ही देशांमधील उत्कृष्ट २५ पुस्तके परस्परांच्या भाषांत भाषांतरासाठी संयुक्त कार्यकारी गटाची स्थापना.

- ब्रह्मपुत्रा नदीवर चीनच्या हद्दीत बांधलेल्या धरणांमधून पाणी सोडणे. खोर्‍यातील पावसाचे तपशील रोज सकाळी आठ व रात्री आठला भारताला कळविणे. एक जून ते १५ ऑक्‍टोबर या काळासाठी दर वर्षी ही माहिती पाठविण्याचे चीनवर बंधनकारक.

- दोन्ही देशांमधील प्रमुख शहरांमध्ये, राज्यांमध्ये त्यांच्या पातळीवर संबंध प्रस्थापित करणे आणि लोकांच्या पातळीवरील संपर्कात वाढ करणे.

- संयुक्त आर्थिक गटांतर्गत तीन कार्यकारी गटांची स्थापना १) सेवा-व्यापारवृद्धी, २) आर्थिक व व्यापारविषयक नियोजन ३) व्यापार संख्याशास्त्रीय विश्‍लेषण

बहुतेक करार अतिशय हास्यास्पद आहेत.चीनचे भारतीय बाजारपेठेवर आक्रमण सुरु आहे. स्वस्त पण निकृष्ट दर्जाच्या वस्तु भारतीय बाजारात विकणे. ऊ.कर्कश आवाजाचे भ्रमणध्वनी, या वस्तु बनवताना लागलेला कच्चा माल हा बहुतेक वेळा घातक असतो ज्याने कर्करोग होण्याचे धोके असतात. आपण अवलंबलेली "वापरा आणि फेकून द्या" प्रवृत्ती आणि या वस्तु खराब झाल्यावर त्या कचर्‍यात फेकल्यामळे भारताच्या पर्यावरणावर परिणाम होतात.

राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लागार मंडळाने केलेली शिफारस धाब्यावर
चिनची सहकार्य करण्याची कारणे आर्थिक आहेत. चीनने प्रचंड अर्थव्यवस्था उभारली आहे. त्यामुळे तिची भूकही प्रचंड आहे. उत्पादनांना असलेल्या मागणीत जराही खंड पडला, तरी चिनी नेते धास्तावतात. मंदीच्या तडाख्यात अमेरिका आहे, युरोपची स्थिती पण नाजूक आहे. आर्थिक विकासाचे चीनचे मॉडेल पूर्णपणे निर्यातीवर आधारित राहिलेले आहे. अशा परिस्थितीत चीन भारताकडे बाजारपेठ म्हणून पाहत आहे. आपला छोट्या-मोठ्या वस्तूंची बाजारपेठ म्हणून भारताचा उपयोग चीनने करून घेतला आहे. याशिवाय भारतातील पायाभूत सुविधांच्या प्रकल्पांमध्ये चीनला स्वारस्य आहे. चीन नक्कीच चतुर आहे. इकडे जमीन गिळत जायचे आणि शांतीच्या गप्पा मारायला ही तयारी दाखवायची. तरीही आपले सरकार निष्क्रिय आहे. चीनशी सामरिक टक्कर घेणे जरुरी आहे. त्यांना कडाडून विरोध हा केलाच पाहिजे. चीनने भारतीय उपखंडात घुसखोरीची भूमिका घेतली असल्याने चीनला भारतीय बाजारपेठेत प्रवेश करू देऊ नये, अशी स्पष्ट शिफारस राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लागार मंडळाने केलेली असताना ती शिफारस धाब्यावर बसवून झेटीई सारख्या कंपन्यांना येथे कारभार करण्यास संमती दिली जात आहे. चिनी कंपन्यांना देशात येऊ देऊ नये, असा अहवाल केंद्रीय गुप्तचर यंत्रणेने सरकारला दिला आहे. चिनी कंपन्यांपेक्षा स्थानिक यंत्रणा निर्मात्यांना प्राधान्य द्यावे, असे सुरक्षा मंडळाच्या अहवालात नमूद केले आहे.

चीनची आर्थिक घुसखोरी
हिंदी-चीनी भाई भाई असे म्हणता म्हणता चीनच्या मेड इन चायना वस्तूंनी भारतात जम बसवला आहे. त्यांनी आतापर्यंत देशी बाजारपेठेतील २० टक्के वाटा पटकावला आहे. किंमती कमी असल्याने भारतीय विक्रते व ग्राहकांचीही चिनी वस्तूंना पसंती लाभत आहे. भारतीय बाजारपेठेत खेळण्या, मोबाईल, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुंपासून आपल्या देवांच्या तसबीरी ते पुजेच्या साहित्यापर्यंत चीनची घुसखोरी आहे. चीनी बोन्सायनेही आपल्या बाजारपेठेत आपले वर्चस्व दाखवायला सुरू केले आहे. आपल्या घरात आणि परसातही या चिनी रोपांचा शिरकाव होतो आहे.

चिनी उत्पादकांनी ‘फेंगशुई’ च्या माध्यमातून गुडलक प्लांट (लकी बांबू) यासारखी काही रोपे भारतीय बाजारपेठेत मोठय़ा प्रमाणात पाठवली आहेतच. त्याचबरोबर आता विविध शोभिवंत रोपेसुद्धा भारतात पाठविली जात आहेत. पुण्यासारख्या छोटय़ा बाजारपेठेत या वर्षी किमान वीस लाख रुपयांची बॉन्साय आली आहेत.

हे प्रमाण झपाटय़ाने वाढत आहे. याशिवाय रोपे लावण्यासाठी मातीऐवजी वापरले जाणारे हायड्रोटोन, जेली असे पदार्थ तसेच, बागकामासाठी लागणार्‍या विविध अवजारांनीसुद्धा भारतीय बाजारपेठत मोठय़ा प्रमाणात जम बसवला आहे. त्यामुळेच हेज कटर, सिकॅटर, विविध प्रकारच्या करवती, स्प्रिंक्लर, इलेक्ट्रॉनिक लॉनमूव्हर अशी चिनी बनावटीची अवजारे स्वस्तात विक्रीसाठी उपलब्ध आहेत. अशा चिनी उत्पादकांचे वितरण करण्यासाठी अनेकजण उत्सुक असल्याचे सध्याचे चित्र आहे.

चिनी कंपन्यांवर बहिष्कार टाका
चीनने आपल्या बाजारात जी घुसखोरी केली आहे त्याला चोख प्रत्युत्तर दिले पाहिजे. चीनच्या विरोधात जागतिकस्तरावर वातावरण निर्माण करणे आणि निषेध खलिते पाठविणे इतकेच आपले सरकार करत आहे.आता आपली बाजारपेठ चिनी वस्तूंनी ओसंडून वाहते आहे. चीनच्या आपल्याबरोबरील धोरणांचा निषेध म्हणून आपण या चिन्यांच्या वस्तूंवर बहिष्कार टाकू शकतो. देशभक्ती म्हणून चिनी वस्तू वापरावयाच्या नाहीत असे ठरवू शकतो. त्यामुळे चीन्यांच्या अर्थव्यवस्थेवर परिणाम होऊ शकेल.

पण आपण अशा बहिष्काराने देशभक्ती दाखवू शकू का? नाही दाखवू शकणार. कारण चीन्यांच्या वस्तूंशी स्पर्धा करण्याकरिता आपल्याला आपल्या वस्तूंच्या किंमती कमी करायला पाहिजेत. आपल्या उद्योजकांची मानसिकताच बदलली आहे. यामुळे आपण चिनी अर्थव्यवस्थेला हातभार लावतो आहोत हे आपल्या लक्षातच येत नाही. आपल्याकडे बेकारी वाढलेली आहे. पुरेशा नोकर्‍या नाहीत. नोकरभरतीच्या ठिकाणी नोकरीसाठी इतकी झुंबड होते की पोलिसांना लाठीचार्ज, प्रसंगी गोळीबारसुद्धा करावा लागतो. या बेकारीमुळे गुन्हेगारी वाढते आहे. शिकलेली तरुण पिढी सैरभैर झाली आहे. बेकार मुलांकरिता तेथे स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज उभाराव्यात म्हणून कोणी आंदोलने का करीत नाहीत.

चीनच्या अर्थव्यवस्थेत घुसखोरी करा
चीनची घुसखोरी दिवसेंदिवस वाढत आहे. जणू भारतीय लोक हातात हारतुरे घेऊन चीनचे स्वागत करीत आहेत, असे त्यांना वाटते. त्यांचा हा गैरसमज दूर करण्यासाठी आपण चिनी मालावर सार्वजनिक बहिष्कार घालावा,'' चिनी मालावर बहिष्कार घालण्यासाठी नागरिकांनी स्वत:हून पुढे यायला हवे. त्यामुळे भारतात आपले स्वागत नव्हे; तर आपल्याला विरोधच होईल,हे चिनी लोकांना चांगले समजेल.'' चीन बांधकामाच्या क्षेत्रात उतरला तर अनेक आव्हाने निर्माण होतील, याचाही आपण विचार करायला हवा.''

चीनच्या आक्रमणाचा मुकाबला करताना आंतरराष्ट्रीय समुदायासमोर या विषयात भारताने अतिशय आक्रमकपणे हा विषय घेऊन जाण्याची गरज होती. मात्र, सरकार याबाबत बोटचेपी भूमिका का घेते आहे? भारतात होणारी शस्त्रास्त्रांची घुसखोरी, नक्षलवाद्यांनी चालविलेला नंगा नाच याला सरकार का शांतपणे पहात बसले आहे. इतकेच नव्हे, तर या नक्षलवाद्यांना पाठबळ देणार्‍या व्यक्तीला तुरुंगातून सुटताच थेट सुरक्षा सल्लागार समितीत स्थान कशाकरिता? भारतीय बाजारपेठेवरील चिनी वस्तूंचे आक्रमण रोखण्याचा विचार भारत सरकारने का केलेला नाही? चिनी सीमेवर सैन्य तैनात करून जी सुरुवात होईल, त्या पाठोपाठ चीनबाबत सडेतोड भूमिका, कठोर कृती, घुसखोरीला पायबंद, चिनी व्यापारावर नियंत्रण, पाकिस्तान-चीन या भारतद्वेषातून निर्माण झालेल्या कुटिल मैत्रीवर करडी नजर, आंतरराष्ट्रीय पातळीवर चीनबाबत वारंवार आवश्यक मांडणी अशा गोष्टी भारताने केल्या पाहिजेत. त्या केल्या तरच हा हैदोस थांबेल, अन्यथा मोठे संकट आपल्यासमोर उभे राहू शकते.

चीनने लडाख मध्ये घुसखोरी केल्याच्या वृत्तावरून आपल्याकडे मोठी खळबळ माजली. मात्र, चीनच्या आणखी एका घुसखोरीकडे म्हणावे तितक्‍या गांभीर्याने लक्ष गेलेले नाही. शिवाय, त्यावर चर्चाही होताना दिसत नाही. घुसखोरी आहे ती आपल्या वीजनिर्मिती आणि दूरसंचार क्षेत्रातील. आपल्या राष्ट्रीय सुरक्षेच्या दृष्टीने ही बाब महत्त्वाची आहे; कारण ऐन वेळी संबंधित प्रकल्पातून बाहेर पडून, चीन भारतीय अर्थव्यवस्थेला इजा पोचवू शकतो. भारताशी नथुला खिंडीद्वारा होणारा व्यापार वाढविण्याचा प्रयत्नही चीन करीत आहे. दक्षिण तिबेटच्या प्रशासनासाठी कोलकत्याच्या बंदराचा वापर करण्याचाही चीनचा विचार आहे. त्याला आपण परवानगी द्यावी काय? चीनने आपल्या अर्थव्यवस्थेत चीनच्या अर्थव्यवस्थेत केली आहे, भारताने मात्र चीनच्या अर्थव्यवस्थेत ती केलेली नाही.