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Tuesday, 6 August 2013

सारे जहां से अच्छा..

सारे जहां से अच्छा..

हम हिंदुस्तानी अपने देश से बहुत प्यार करते है और इसे एक मुकम्मल मुल्क बनाना चाहते हैं। ढेरों शिकायते हैं, इसके बाद भी हम कहते है, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा। वो कौन सी बाते हैं, जो देश से हमारे प्यार को बढ़ाती हैं और वो कौन सी बातें है, जो हमें नहीं आतीं। आम व खास लोगों के साथ इस पर एक नजर
1. रिश्ते ही रिश्ते
भारत में सबसे ज्यादा प्यारी चीज हैं हमारे रिश्ते। मा-पिता-बच्चे, चाचा-चाची, दादा-दादी, नाना-नानी, बुआ-फूफा, मामा-मामी, दीदी-जीजाजी, देवर-भाभी, मौसा-मौसी..रिश्तों की लंबी लिस्ट है हमारे यहा। सिर्फ अंकल-आटी कहने से यहा बात नहीं बनती।
2. हम साथ-साथ हैं
भारतीय परंपरा में अभी भी संयुक्त परिवारों के लिए जगह है। माता-पिता अपने बच्चों ही नहीं, पोते-पोतियों तक की परवरिश करते हैं।
3. जश्न और उत्सवधर्मिता
कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या तारीख है, हमें तो जश्न मनाने का बहाना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई.. सबके त्योहार मनाते हैं हम।
4. अतिथि देवो भव..
मेहमा जो हमारा होता है- वो जान से प्यारा होता है.., इस गीत का संदर्भ लें तो हम अपने घर ही नहीं, देश में भी आने वाले लोगों की खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ते। आखिर ऐसा क्यों न हो, हमारी संस्कृति में अतिथि का स्थान देवतुल्य माना गया है।
5. मैं चाहे ये करूं-मैं चाहे वो करूं
क्या यह कम खुशी की बात है कि हम एक लोकतात्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं! पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था, डेमोक्रेसी इज द गवर्नमेंट ऑफ द पीपल, बाय द पीपल, फॉर द पीपल। यह बात हमारे लोकतात्रिक देश पर पूरी तरह लागू होती है। हमें धर्म, शिक्षा, अभिव्यक्ति, एक से दूसरे स्थान पर जाने सहित कई अधिकार मिले हुए हैं।
6. विविधता में एकता
रंग-बिरंगी है संस्कृति हमारे देश की। इसीलिए तो कहा गया है, कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी, लेकिन विविधताओं के बावजूद इस देश में एकता है।
7. बैंड बाजा बारात
इस रंगीन देश का हर आयोजन रंगीन है। जन्म, शादी व संस्कार.. जिंदगी के हर पड़ाव पर मौज-मस्ती, धूमधड़ाका हमारी फितरत है।
8. प्रतिभाओं का देश
नए विचारों व प्रतिभाओं की भारत में कोई कमी नहीं। यहा के चुनिंदा दिमाग विश्वभर में अपने ज्ञान का परचम लहरा रहे हैं। कोई भी क्षेत्र हो, हमने हर जगह अपनी काबिलीयत प्रमाणित की है।
9. परोपकार है परमधर्म
दुख किसी का भी हो, हम उसमें शामिल होते हैं और मदद का हाथ आगे बढ़ाने से पीछे नहीं हटते। पड़ोसी धर्म निभाना हो या सामाजिक धर्म.., इंसानियत अभी बाकी है यहा।
10. थोडे़ में गुजारा होता है
हमें तो कबीरदास सिखा गए हैं, साईं इतना दीजै जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए..। कम से कम संसाधनों में जीने की जिद हम भारतीयों में पैदाइशी होती है।
गुलिस्ता को क्या हुआ..

अपने देश से प्यार है तो शिकायतें भी कम नहीं हैं हमें। जानें क्या-क्या हैं ये शिकायतें।

1. भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का खेल
नौकरशाही से राजनीति तक.. भ्रष्टाचार की जडें़ यहा बहुत गहरी हो चुकी हैं। हजारों अन्ना आदोलन करें, तब शायद बदलाव आ सके।
2. हॉरर किलिंग
आजादी के इतने वर्षों बाद भी जाति व गोत्र के नाम पर ऑनर किलिंग की घटनाएं हो रही हैं। विकास की राह में ऐसी बातें बहुत बड़ा रोड़ा हैं।
3. टैक्स की मार
आम जनता बढ़ती महंगाई व टैक्स की मार से त्राहि-त्राहि कर रही है। आय पर टैक्स, बाहर खाने व सड़क पर चलने का टैक्स..। हम भारतीयों की पूरी उम्र टैक्स चुकाने में ही खत्म हो जा रही है।
4. ट्रैफिक जाम
कितने फ्लाईओवर बनें, मेट्रो सेवाएं शुरू हों, सड़कों पर भीड़ कम नहीं होती। घर से निकलने के बाद मालूम नहीं होता कि वापस कब लौटेंगे।
5. पर्यावरण की परवाह क्या
अपने घर में हम सफाई पसंद हैं, लेकिन बाहर कूड़ा फेंकने से बाज नहीं आते। प्लास्टिक व कचरा सड़कों पर फेंकते हुए हमारे हाथ नहीं कापते।
6. अजब लोकतंत्र की गजब व्यवस्था
आजादी के इतने वर्षों बाद भी गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी के अलावा आतंकवाद, जाति-धर्म जैसे बडे़ कारण हमें चिंतित करने को काफी हैं। लोकतंत्र राजनेताओं की बपौती हो चुका है। हम यही सोचकर खुश हैं कि लोकतंत्र में हैं और व्यवस्था तो खैर.. रामभरोसे है।
7. विरोधाभासों का देश
एक ओर मॉल्स-मल्टीप्लेक्सेज तो दूसरी ओर न्यूनतम पब्लिक ट्रासपोर्ट तक नहीं, एक ओर देवी पूजन, दूसरी ओर बलात्कार व दहेजहत्या, एक तरफ आस्था, दूसरी ओर अंधविश्वास, एक ओर विकास के नारे, दूसरी ओर गावों में मूलभूत सुविधाएं नहीं..।
8. सिर्फ अपनी मर्जी
आजादी का नकारात्मक पहलू यह है कि हम अपनी मर्जी को बहुत महत्व देने लगे हैं। अनुशासन व समय की पाबंदी का हमें ख्याल नहीं है। सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग करना हमें जन्मसिद्ध अधिकार लगता है।
9. विकृत मानसिकता
या देवी सर्वभूतेषु वाले देश का हाल यह है कि जगह-जगह दीवारों पर और सार्वजनिक शौचालयों तक में स्त्री को अपमानित करने वाले जुमले देखे जा सकते हैं। यह बात कश्मीर से कन्याकुमारी तक लागू होती है।
10. गिले-शिकवे का देश
अंत में एक बात हम सभी पर लागू होती है। हम व्यवस्था में सुधार तो चाहते हैं, लेकिन इसके लिए पहलकदमी नहीं करना चाहते। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि तो हम चाहते हैं, लेकिन अपने नहीं-पड़ोसी के घर में।

मैं युवाओं से अपील करता हूं कि बेहतर भारत के लिए वे एकजुट हों। भ्रष्टाचार से मुक्त होकर ही हम सही मायने में आजाद कहलाएंगे। यह हमारा दूसरा स्वतंत्रता संग्राम होगा।
-विवेक ओबेराय

राजनेताओं का असंसदीय व्यवहार मुझे समझ नहीं आता। जब ये सदन में कुर्सिया फेंकते हैं, मारपीट करते, गालिया देते हैं, कागज फाड़ते हैं, तब संविधान के प्रति इनका सम्मान कहा चला जाता है?
-अनुपम खेर

Monday, 29 July 2013

संसद.. Parliament..

संसद..Parliament..

 एक नजर हमारे पूरे संसद और उसकी सभी कार्यप्रणाली पर !

 

Part 1 -  Part 2 -  Part 3 - Part 4 -

 


संसद,केन्द्र सरकार का विधाय अंग हे. संसदीय प्रणाली,जिसे सरकार का वेस्टमिस्तर माडल भी कहते हे,अपनाने के कारण भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था मे संसद एक विशिष्ट व केन्द्रीय स्थान रखती है .
संविधान के पाचवे भाग के अंतर्गत अनुच्छेद ७९ से १२२ मे संसद के गठन ,संरचना,अधिकारियो,प्रक्रिया,विशेषाधिकार,व श्क्ति आदि के बारे मे वर्णन किया गया है. 

संसद का गठन-

               संविधान के अनुसार भारत की संसद के तीन अंग है- राष्ट्रपति,लोकसभा व राज्यसभा . १९५४ मे राज्य परिषद एव जनता का सदन के स्थान पर क्रमश; राज्यसभा एव लोकसभा शब्द अपनाया गया। राज्यसभा ,उच्च सदम कहलाता है जबकि लोकसभा निचला सदन कहलाता है। राज्यसभा मे राज्य व संघ राज्य शेट्रो के प्रतिनिधि होते है, जबकि लोकसभा सम्पूर्ण रूप मे भारत के लोगो का प्रतिनिधितव करती है।

हालाकी राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है और न ही वह संसद मे बैठता है। लेकिन राष्ट्रपति ,संसद का अभिन्न अंग है। एसा इसलिये है क्योकी संसद के दोनो सदनो द्वारा पारित कोई विधेयक तब तक विधि नहीं बंटा ,जब तक राष्ट्रपति उसे अपनी अधिकृति न देता। राष्ट्रपति,संसद के कुछ चुनिंदा कार्य भी करता है।उदाहरण स्वरूप -राष्ट्रपति दोनो सदनो का सत्र आहूत करता है। याफिर सत्रावसान करता है। वह लोकसभा को विघटित कर सकता है। जब संसद का सत्र न चल रहा हो, वह अध्यादेश जारी कर सकता है आदि।

इस मामले मे भारतीय संविधान ,अमेरिका के स्थान पर ब्रिटेन की पद्धति पर आधारित है। ब्रिटेन की संसद ताज (राजा या रानी) ,हॉउस ऑफ लॉर्ड व हॉउस ऑफ कॉमन्स से मिलकर बनती है। इसके विपरीत,अमेरिका राष्ट्रपति विधानमंडल का महतवपूर्ण अंग नहीं है। अमेरिका विधानमंडल के कॉंग्रेस के नाम से जाना जाता है। कॉंग्रेस के अंतर्गत सीनेट ,हॉउस ऑफ रीप्रेसेन्टिव होते है।
सरकार की संसदीय पद्धति मे विधाय व कार्यकारी अंगो मे परस्पर निर्भरता पर जोर दिया जाता है। अंत; हमारे संसद मे राष्ट्रपति ,ब्रिटेन की संसद मे ताज की तरह है। वह दूसरी तरह, राष्ट्रपति पद्धति वाली सरकार मे विधाय और कार्यकारी अंगो को अलग करने पर जोर दिया जाता है। इसीलिये अमेरिका राष्ट्रपति,कॉंग्रेस का घटक नहीं माना जाता है।

दोनो सदनो की संरचना-  


राजसभा की संरचना:
                    राज्यसभा की अधिकतम सांख्या २०५ निर्धारित है। इनमे मे २३८ सदस्य राज्यो व संघ राज्यो शेत्र के प्रतिनिधि (अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित) होंगे, जबकि १२ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोमित किये जायेंगे।
वर्तमान मे राज्यसभा मे २४५ सदस्य है।इनमे २२९ सदस्य राज्यो का प्रतिनिधितव करते है,४ संघ राज्य शेत्र का प्रतिनिधितव करते है और १२ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोमित है।
संविधान की चौथी अनुसूची मे राज्यसभा के लिये राज्यो व संघ ष्ट्र मे सीटो के आवंटन का वर्णन किया है।
१) राज्यो का प्रतिनिधितव:
                      राज्यसभा मे राज्यो के प्रतिनिधि का निर्वाचन राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य करते है। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधितव पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। राज्यसभा के लिये राज्यो की सीटो का बंटवारा उनकी जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। इसलिये राज्यो के प्रतिनिधीयो की सांख्या अलग-अलग राज्यो मे अलग होती है। उदाहरण स्वरूप- उत्तर प्रदेश से ३१ सदस्य है जबकि त्रिपुरा से १ सदस्य है। अमेरिका मे "सीनेट" मे राज्यो का प्रतिनिधितव बराबर होता है (जनसंख्या के आधार पर नहीं). हालांकि अमेरिका मे,जनसंख्या के स्थान पर सभी राज्यो को सीनेट मे समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। अमेरिकी सीनेट मे कुल १०० सीटे है तथा प्रटेक राज्य को २ सीटे प्राप्त है।

२) संघ राज्य शेत्र का प्रतिनिधित्व:
                             राज्यसभा मे संघ राज्यशेत्र का प्रटेक प्रतिनिधि इस कार्य के लिये निर्मित एक निर्वाचक मंडल स्वारा चुना जाता है। यह चुनाव भी  आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। ७ संघ राज्य शेत्र मे से सिर्फ २ (दिल्ली व पद्डुचेरी) के प्रतिनिधि राज्यसभा मे है। अन्य पांच संघ शासित प्रदेशो की जनसख्या तुलनात्मक रूप से काफी काम होने के कारण राज्यसभा मे उन्हे अलग प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।

३) नामित या नाम निर्देशित सदस्य:
                              राष्ट्रपति,राज्यसभा मे १२ एसे सद्स्यो को नामित या नाम निर्देशित करता है। जिन्हे कला ,साहित्य,विज्ञान और समाजसेवा ,विषयो के सम्बंध मे विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव हो। एसे व्यक्तियो को नामांकित करने के पीछे उद्देश् है की, नामी या प्रसिध व्यक्ति बिना चुनाव के राज्यसभा मे जा सके। यहा यह ध्यान देने वाली बात है की अमेरिकी सीनेट मे कोई नामित सदस्य नहीं होता है।

लोकसभा की संरचना:
                     लोकसभा की अधिकतम सांख्या ५५२ निर्धारित की गयी है। इनमे से ५३० राज्यो के प्रतिनिधि ,२० संघ राज्य शेत्र के प्रतिनिधि होते है। एगलो-इंडियन समुदाय के दो सद्स्यो को राष्ट्रपति नामित या नाम निर्देशित करता है।
                    वर्तमान मे लोकसभा मे ५४५ सदस्य है। इनमे से ५३० सदस्य राज्यो से, १३ सदस्य संघ राज्य शेत्र से और दो सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित या नाम निर्देशित एंग्लो-इंडियन से है।

१) राज्यो का प्रतिनिधित्व:            
                    लोकसभा मे राज्यो के प्रतिनिधि राज्यो के विभिन्न निर्वाचन ष्ट्र के लोगो द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते है। भारत के हर नागरिक को जिसकी उम्र १८ वर्ष से अधिक है और जिसे संविधान या विधि के उपबंधो के मुताबिक अयोग्य नहीं ठहराया गया हो, मत देने का अधिकार है। ६१वे संविधान संशोधन अधिनियम , १९८८ द्वारा मत देने की आयु सीमा को २१ वर्ष से घटकर १८ वर्ष कर दिया।

२) संघ राज्यशेत्र का प्रतिनिधित्व:
                            संविधान से संसद के संघ राज्यष्त्र के प्रतिनिधीयो को चुनने की विधि के निर्धारण का अधिकार दिया है। इसी के तहत संसद ने संघ राज्य शेत्र अधिनियम १९६५ बनाया, जिसके तहत संघ राज्य शेत्र से प्रत्यक्ष निर्वाचन के तहत लोकसभा के सदस्य चुने जाते है।

३) नामित या नाम निर्देशित सदस्य:
                              अगर एंग्लो-इंडियन समुदाय का लोकसभा मे पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो, तो राष्ट्रपति इस समुदाय के दो लोगो को नामित या उनका नाम निर्देशित कर सकता है। शुरुवात मे या उपबंध १९६० तक के लिये थी लेकिन ७९वे संविधान संशोधन अधिनियम १९९९ मे इस उपबंध को २०१० तक के लिये बढ़ा दिया गया।
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Part 1 - Part 2 - Part 3 - Part 4-



                  

Sunday, 28 July 2013

संसद...Parliament भाग ३

संसद...Parliament -  

भाग ३

Part 1 - Part 2 - Part 3 -Part 4 -

दोनो सदनो की अवधि :
                

राज्यसभा की अवधि -

                   राज्यसभा (पहली बार १९५२ मे स्थापित) निरंतर चलने वाली संस्था है। यानी, यह एक स्थायी संस्था है और इसका विघटन नहीं होता किन्तु इसके एक-तिहा सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत होते है। ये सीटे चुनाव के द्वारा फिर भरी जाती है और राष्ट्रपति द्वारा har तीसरे वर्ष के शुरुवात मे मनोचयन होता है। सेवा निवृत होने वेल सदस्य कितनी बार भी चुनाव लड़ सकते है और नामित हो सकते है।
                    संविधान ने राज्यसभा के सद्स्यो के लिए पदावधि निर्धारित नहीं की थी, इसे संसद पर छोड़ दिया गया था। इसी के तहत जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (१९५१) के आधार पर संसद ने कहा की, राज्यसभा के सद्स्यो की पदावधि छह साल की होनी चाहिए। इस अधिनियम ने भारत के राष्ट्रपति को पहली राज्यसभा मे चुने गए सद्स्यो की पदावधि काम करने का अधिकार दिया। पहले बैच मे यह तय हुआ की लॉटरी के आधार पर सद्स्यो को सेवानिवृत किया जाए। इसके अलावा ,इस अधिनियम द्वारा राष्ट्रपति को राज्यसभा के सद्स्यो की सेवानिवृत्ति के आदेश को शासित करने वाले उपबंध बनाने का अधिकार भी दिया गया।

लोकसभा की अवधि -

                  राज्यसभा से अलग, लोकसभा जारी रहने वाली संस्था नहीं है। सामान्य तौर पर इसकी अवधि आम चुनाव के बाद हुई पहली बैठक से पांच वर्ष के लिए होती है, इसके बाद यह खुद विघटित हो जाती है। हालांकि राष्ट्रपति को पांच स्सल से पेहले किसी भी समय विघटित करने का अधिकार है। इसके खिलाफ न्यायालय मे चुनोती नहीं दी जा सकती।
                   इसके अलावा लोकसभा की अवधि आपात की स्थिति मे एक बार मे एक वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। लेकिन इसका विस्तार किसी भी दशा मे आपातकाल खत्म होने बाद छह महीने की अवधि से अधिक नहीं हो सकता।


Part 1 - Part 2 - Part 3 - Part 4 -



प्रशासना बद्दल महत्वाचे..

प्रशासना बद्दल महत्वाचे..

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 डिस्क्लेमर: लोकप्रशासनावरील हा ऑथेंटिक वगैरे लेख नाही. प्रशासनाशी सहसा संबंध न येणाऱ्या मित्रांना ढोबळ कल्पना यावी एवढाच हेतू आहे. कुणी भर टाकल्यास स्वागत आणि आनंद आहे. काही चूक आढळल्यास अवश्य सांगावे.

जिल्हा प्रशासनामध्ये दोन प्रमुख उतरंडी असतात. राज्या राज्यांनुसार थोडे फरक असतात. प्रस्तुत संदर्भामध्ये –

विकास (डेव्हलपमेंट) उतरंड / हाएरार्की–

कलेक्टर – पीडी(डीआरडीए)/ अध्यक्ष जि.प. – बीडीओ/ सभापती पंचायत समिती – पीइओ/ सरपंच

पीडी(डीआरडीए) – प्रोजेक्ट डायरेक्टर (डिस्ट्रिक्ट रुरल डेव्हलपमेंट एजन्सी) (महाराष्ट्रात सीइओ असतात, पीडी पेक्षा रॅंक आणि जबाबदारीने वरचे पद); बीडीओ – ब्लॉक डेव्हलपमेंट ऑफिसर; पीइओ - पंचायत एक्स्टेन्शन ऑफिसर (महाराष्ट्रात ग्रामसेवक असतात.).

महसूल (रेव्हेन्यू) उतरंड –

कलेक्टर (जिल्हाधिकारी/ जिल्लापाळ) – सबकलेक्टर (उपजिल्हाधिकारी/ उपजिल्लापाळ - प्रांत) – तहसीलदार – रेव्हेन्यू इन्स्पेक्टर.

(रेव्हेन्यू इन्स्पेक्टर हा साधारणपणे पन्नास साठ गावे पाहतो. जमीनीचे सर्व कागद याच्या ताब्यात असतात. सरकारची शेवटची कडी. पृथ्वीवरचा सर्वात महत्त्वाचा माणूस! आपल्याकडे जसा तलाठी!)

याशिवाय कायदा सुव्यवस्था राखण्याची जबाबदारी या महसूल यंत्रणेतील अधिकाऱ्यांकडे असते. ते एक्झिक्युटिव्ह मॅजिस्ट्रेट असतात. म्हणजे कलेक्टर असतो डिस्ट्रिक्ट मॅजिस्ट्रेट (डीएम), सबकलेक्टर – सब डिव्हिजनल मॅजिस्ट्रेट (एसडीएम), तहसीलदार – एक्झिक्युटिव्ह मॅजिस्ट्रेट. ही मंडळी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, तसेच पोलीस ऍक्ट अंतर्गत काही अधिकार बाळगून असतात. कायदा सुव्यवस्थेसाठी हे जबाबदार असतात, आणि पोलीसांच्या साहाय्याने त्यांनी हे काम करायचे असते. गुन्हे तपासामध्ये यांचा काही संबंध नसतो. ते पोलीसांचे काम. म्हणजे पोलीसांना दुहेरी काम असते – कायदा-सुव्यवस्था, आणि गुन्हे अन्वेषण. [हे ग्रामीण भागात. शहरी भागात पोलीस कमिशनरेट असेल, तर असे अधिकार पोलीसांकडेच असतात. म्हणून त्यांना कमिशनर असे पद असते. म्हणजे आयुक्त – आयोगाचे अधिकारी, अर्धन्यायिक काम. पोलीस त्यामुळे कायदा सुव्यवस्था संपूर्णपणे सांभाळतात. तसेच वेगवेगळ्या किरकोळ परवानग्या/ लायसेन्स – मोर्चा/ लाउडस्पीकर/ इ. तेच देतात.]

तसेच, डिझॅस्टर मॅनेजमेंट ही संपूर्णपणे रेव्हेन्यू अधिकाऱ्यांची जबाबदारी असते. इमर्जन्सी ड्यूटी यांच्याकडे असते. उदा. पूर, दुष्काळ, उष्माघात, अपघात, इ.

निवडणुकांचे काम रेव्हेन्य़ू अधिकाऱ्यांनाच करावे लागते.

जनगणना यांच्याकरवीच.

व्यक्तीच्या ओळखीशी संबंधित रहिवासी प्रमाणपत्र, जातीचे दाखले, उत्पन्नाचे दाखले, पासपोर्टसाठी प्रमाणपत्र इ. दाखले देण्याचे अधिकार यांच्याकडे असतात. कदाचित माणसाची ओळख जमिनीशी निगडित असते, आणि जमिनीचे काम बघणारे लोक म्हणून असेल. (काही राज्यांत हे अधिकार लोकनियुक्त प्रतिनिधींना दिलेले आहेत, पण अशी प्रमाणपत्रे सगळीकडे ग्राह्य धरली जात नाहीत, फॉर ऑबव्हियस रीझन्स, आणि मुळातच ते त्यांचे काम नव्हेच.)

ही ठळक कामे. याशिवाय बरीच कामे असतात.

इतर विभाग – लाइन डिपार्टमेंट्स

यांना जिल्हे नसतात. म्हणजे यांचे जिल्हे थोडे वेगळे असतात असे म्हणणे जास्त योग्य ठरेल. म्हणजे असं – प्रत्येक खात्यासाठी एकेक मंत्री असतात. ते राज्यातले त्या त्या खात्याचे टॉप एक्झिक्युटिव्ह. हे टू इन वन असतात – एक्झिक्युटिव्ह पण आणि लेजिस्लेटर पण. जसे रेव्हेन्यू अधिकारी टू इन वन असतात – एक्झिक्युटिव्ह पण आणि (क्वासी) ज्युडिशियल पण.

मंत्री – सेक्रेटरी – डायरेक्टर – जिल्हा स्तरावरील अधिकारी.

उदा. शिक्षण मंत्री – शिक्षण सचिव – शिक्षण संचालक – जिल्हा शिक्षण अधिकारी – शिक्षण निरीक्षक.

हे ढोबळ उदाहरण झाले. प्रत्यक्षात थोडी अधिक गुंतागुंत असते. म्हणजे, वरील उदाहरणात बीडीओ, जिल्हा परिषद, कलेक्टर यांचेही अधिकार मिसळलेले असतात. शिवाय, सचिवालयाची वेगळी उतरंड असते, निर्देशालयाची (डायरेक्टोरेट/ डिरेक्टोरेट) वेगळी उतरंड.

सेक्रेटरी – सचिव हे खरे नोकरशहा. ब्युरोक्रॅट्स. मंत्र्यांचे सल्लागार. हे एक्झिक्युटिव्ह यंत्रणेचे सगळ्यात वरचे अधिकारी. डायरेक्टर म्हणजे फिल्डवरचे लोक आणि ब्युरोक्रॅट्सना जोडणारी कडी. यांच्या कामात सचिव आणि जिल्हा स्तरावरचे अधिकारी यांच्या प्रोफाइलचा संगम असतो. जिल्हा स्तरावरचे अधिकारी म्हणजे फिल्डवरचे लोक.

फिल्डवरचे सगळे अधिकारी जरी आपापल्या उतरंडीमध्ये काम करत असले, तरीही जिल्हा प्रशासनाला टाळून त्यांना काम करता येत नाही. त्यामुळे जिल्हा प्रशासन प्रमुख अर्थात कलेक्टर हा एकप्रकारे त्यांचा (म्हणजे सगळ्या जिल्ह्याचाच) सुपरवायजरी अधिकारी असतो.

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विशेष टिप्पणी!

आमदार/ खासदार/ लोकनियुक्त प्रतिनिधी यात नेमके कुठे येतात हे सूज्ञांना वेगळे सांगायला नकोच.

माझ्या मते ते ‘नेमके’ कुठेच नसतात, दुधात मिसळलेल्या साखरेसारखे/ मिठाच्या खड्याप्रमाणे सर्वव्यापी असतात! त्यांच्या चवीनुसार व्यवस्था नीट काम करते किंवा फेफरे आल्यासारखी वागून आपली वाट लावते.

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एक वेळ जेवण करून MPSC ची तयारी..!

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आम्हाला बदलेला देश बघायचा आहे..!!

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या देशात स्वातंत्र्य आहे, हे एक नेहमीचंच नियमित वाक्य. शुभ्र कपड्यातील गुंडांनी ग्रासलेला हा देश खऱ्या स्वातंत्र्या साठी अजून ही विव्हळत आहे. लहानपणी वाटायचं जग बदलण अगदी सोप्प आहे; १५ ऑगस्ट आणि २६ जानेवारी ला शाळेत मिरवणूक निघायची आम्ही त्यात उत्साहाने सामील व्हायचो, उरामध्ये प्रचंड स्वाभिमान घेऊन आगदी बेंबीच्या देठा पासून "भारत माता कि जय" चे नारे द्यायचो. लहानपणी बऱ्याच खोड्या देखील करायचो पण मनामध्ये नेहमी एक भीती असायची की चूक केली तर शिक्षा होईल. शिक्षकांची, पालकांची, वडिलधाऱ्यांची एक भीती असायची, म्हणून वाटायच खऱ्या देशात देखील असंच सरकारला आणि न्यायाला भीत असतील लोक. पण जसा जसा मोठा होत गेलो तसं तसा खरा भारत दिसायला लागला. इथे लोक घाबरतात पण न्यायाला नाही तर जे लोक आपल्या खिशामध्ये न्याय घेऊन फिरतात त्यांना. दिवसा ढवळ्या या देशाला लुटणाऱ्या लुटारूंना, आणि या भारत मातेच्या अब्रूचे धिंडवडे उडवणाऱ्या सैतानांना. एखादा प्रमाणपत्र काढायचं झाल तर जिथे २ दिवस लागायचे तिथे ७ दिवस लागतात कारण काय तर कामाचा बोजा, आणि ५० रुपये पुढे केले तर २ दिवसाचे काम २ तासामध्ये होते. कारण काय तर पैसा. पुढे कळायला लागला हा पैसा ह्या लोकांच्या घरात जात नाही तर दारूच्या दुकानात जातो, यांच्या मुलांच्या डोनेशन मध्ये जातो, ५०-५० रुपयांचा भ्रष्टाचार वेगळाच, पण १००-१०० करोड रुपयांचा घोटाळा ही होतो हे लक्षात यायला लागल. आजवर विकासाच्या नावावर करोडो रुपयांची अगदी राख रांगोळी झाली, पण विकासाचा लवलेशही अजून पर्यंत आमच्या करोडो भारतीयांच्या नशिबाला आला नाही.
निवडणुका म्हणजे आमच्या देशात राष्ट्रीय सनासारख्या झाल्या आहेत, दर वर्षांनी, महिन्यांनी कसली न कसली निवडणूक घ्यायची, लोकांच्या कल्याणाची भाषा करायची, आम्ही ही ती ऐकायची आणि टाळ्या वाजवून पुन्हा ये रे माझ्या मागल्या! तेच ते चालू आहे, १ नाही २ नाही गेली ६० वर्षे आम्ही तेच ते बघतो आहोत. स्वतंत्र भारतात तीन पिढ्या बदलल्या पण आमच्या समस्या त्याच होत्या आणि आज ही त्याच आहेत; किंबहुना त्या समस्यांनी आता महाकाय स्वरूप घेतलं आहे. देश तर स्वतंत्र झाला, पण आम्ही अजून ही गुलामच राहिलो. स्वतःच्या स्वातंत्र्य साठी स्वतःलाच लढावे लागते, पण लढणे म्हणजे काय हेच आता आम्ही विसरलो आहोत.

कुठे तरी एक छान वाक्य ऐकलय, आपलीच गाडी आपलीच माडी आणि आपल्याच बायकोची गोल गोल साडी, फ़क़्त एवढ्या पुरतेच आम्ही मर्यादित राहिलो आहोत. रोज अन्याय होतो म्हणून प्रत्येक जन रडत असतो, झोपडीत राहणाऱ्या सामान्य माणसापासून ते मोठ मोठ्या उद्योगपतीन पर्यंत सर्व च्या सर्व फ़क़्त आणि फ़क़्त रडत असतात, पण कधी ही कुणी पेटून उठत नाही, कधी कुणाची हाक ऐकू आलीच तर आम्ही साधा प्रतिसादसुद्धा देत नाहीत. स्वतंत्र भारतात आम्ही गुलाम आहोत अज्ञानाचे, भ्रष्टाचारचे, बेरोजगारीचे, निरक्षरतेचे, धर्मांधतेचे, आणि जाती पतीने ग्रासलेल्या घाणेरड्या मानसिकतेचे.

सुवर्ण अक्षरात लिहून ठेवावा इतका तेजस्वी आणि ओजस्वी इतिहास असणारे आम्ही एवढे निष्प्राण, निस्तेज कसे? कधी ऐकू येणार ती आरोळी, भारत माता की म्हंटल की कधी सबंध देश एका आवाजात "जय" चा उदघोष करणार? प्रत्येकाने आपल्या लहानपणी पाहिलेले भारत देशाचे स्वप्न कधी साकार होणार? ज्या महापुरुषांची भाषणे आम्ही द्यायचो, ऐकायचो कधी त्यांच्या विचारांना आम्ही आमच्या जीवनात खरं स्थान देणार आहोत? कित्येक स्वातंत्र्य दिन आले, येतील आणि जातील देखील पण जो बदल सहज घडेल असे कधी वाटायचे त्या बदलाची सुरुवात कधी होणार?

निराशेने ग्रासलेल्या या देशाला खऱ्या स्वातंत्र्याचा सूर्य दाखवायचा असेल तर एक सशक्त आणि ठणठणीत विचारच हे काम साध्य करू शकतो. नशिबाने येणारी नवी पिढी विचार करणारी आहे, जी पिढी स्वतःच्या उत्कर्षासाठी दिवस रात्र मेहनत घेऊन आपला आयुष्य उभारतात त्या पिढी कडून हा देश ही घडण्याची देखील अपेक्षा आहे. आपल्या सारखे विचार करणारे खूप आहेत, बदलाची आणि खऱ्या स्वातंत्र्याची प्रचंड भूक लागलेले खूपजन आहेत, म्हणूनच एक नवी आशा निर्माण झालीये- 'आम्हाला बदलेला देश बघायचा आहे'. जे स्वप्न आम्ही लहान पाणी बघायचो त्या निर्मळ स्वप्नासाठी आपल्या प्रत्येकाला आपला सहभाग द्यावाच लागेल. कुठलही देश एका रात्री मध्ये उभा राहत नाही, त्या साठी वर्षानुवर्षे कठोर मेहनत घ्यावी लागले, आमच्या नशिबाने आमच्या महापुरुषांनी ही मेहनत घेतली आहे गरज आहे फ़क़्त त्यांच्या विचारांची कास धरून नवे पाऊल उचलण्याची, हे नवे पाऊल उचलण्याची प्रतिज्ञा आजच्या या स्वातंत्र्य दिनी घेऊन, हातामध्ये हात घेऊन सबंध देश घेऊन पुढे जाऊया. जमेल तेथे- जमेल त्या प्रकारे- जमेल ते प्रयत्न राष्ट्रनिर्मिती साठी करूयात. प्रयत्न छोटा आहे किंवा मोठा आहे न बघता प्रयत्न कण्यावर भर देवूयात. रोजच तो प्रयत्न होत असेल तर ठीक आणि नसेल होत तर आठवण येईल तेंवा तो करत राहुयात. पर्फेक्षनिष्टांच्या टीकांना दुर्लक्षित करून जमेल त्या प्रमाणात राष्ट्रकार्यात सहभाग घेऊयात. संघटना झालीच तर खूप छान, पण संघटना नाही म्हणून थांबायला नको, सुरवात करूयात, इतरलोक काही करत असतील तर त्यांना मदत करूयात. कमीत कमी अन्यायाची जाणीव अज्ञानात खिचपत पडलेल्या समाजाला तर कुणीही करून देऊ शकतो. नाहीच लढता आला तर अन्याय होतोय हे तरी मान्य करा.

महाराष्ट्रात, छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या विचारांनी पेरलेली आपली मस्तके नापीक होवूच शकत नाहीत कारण त्यांना वेळोवेळी फुले, टिळक, आंबेडकर यांनी विचारांचा खात घातलाय. तेव्हा स्वाभिमानाने, निधड्या छातीने पसरलेल्या अंधाकाराला दूर करण्यासाठी हवे ते प्रयत्न करा.

प्रत्येक तळमळ असलेल्या भारतीय युवकांना आवाहन आहे. हे पाऊल तुम्हीच उचलण्याची गरज आहे. अथक प्रयत्नाने आणि हजारोंचे रक्त सांडून आपला देश स्वतंत्र झाला, त्या सर्वांच्या सांडलेल्या रक्ताची शपथ आहे तुम्हाला, जमेल तिथे जमेल त्या प्रकारे एक खरा स्वतंत्र भारत निर्माण करण्यासाठी तुम्ही हे पाऊल उचला.
तुम्हाला साथ आहे आमची, आणि आमच्या सारख्या हजारोंची.

जय हिंद ! 

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महाराष्ट्रातील काही यशस्वी युपीएससी UPSC सनदी सेवा उमेदवार

महाराष्ट्रातील काही यशस्वी युपीएससी UPSC सनदी सेवा उमेदवार. सर्व यशस्वी उमेदवारंचे अभिनंदन. यादीत एखादे नाव चुकले असल्यास क्षमा करावी, यादी ऑटोमेटेड आहे.


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Thursday, 25 July 2013

शिक्षण,शिक्षक व विद्यार्थी: एक चिंतन


शिक्षण,शिक्षक व विद्यार्थी: एक चिंतन

समाजाचे एकक आहे व्यक्ती, मानवप्राणी. या मानवप्राण्याचा बाल्यावस्थेतून प्रौढावस्था व नंतर वृद्धावस्था असा प्रवास होतो. बाल्यावस्थेत तो शिक्षण घेतो, प्रौढावस्थेत या शिक्षणाचा वापर करून अर्थार्जन करतो, समाजोपयोगी कार्ये करतो आणि वृद्धावस्थेत प्रौढावस्थेतील धन व मान-सन्मान या कमाईच्या आधारे मृत्युकडे वाटचाल करतो. वृद्धावस्थेत आपल्या अनुभवाचा वापर तो बालकांना शिक्षण व प्रौढांना मोलाचा सल्ला द्यायला करू शकतो. बालकाचा विकास प्रौढामध्ये करण्यासाठी पालक, शिक्षक व समाज या तीन घटकांचे सुसंवादी प्रयत्न आवश्यक असतात. या तिन्ही घटकांपैकी शिक्षकाची भुमिका विशेष महत्त्वाची असते. या तिन्ही घटकांमधला सुसंवाद अधीक सखोल करण्याचे कार्य शिक्षकाचे असते. या तिन्ही घटकांमधला परस्पर विश्वास या सुसंवादाची खोली ठरवतो. पण सध्याच्या काळात समाजात शिक्षकाविषय़ी बरेच नकारात्मक समज पसरू लागलेत.शिक्षकाच्या ज्ञानाविषयी, शिक्षक म्हणुन त्याच्या योग्यतेविषयी पालक व समाज अविश्वास व्यक्त करताहेत. या सर्व अविश्वासमय वतावरणामूळे शिक्षणाचा मुळ हेतूच हरवत चाललाय.

खरेतर शिक्षण व्यक्तीच्या व्यक्तिमत्त्वात सकारात्मक बदल घडवते. त्याला जगण्याला लायक बनवते. जगताना येणा-या समस्यांशी दोन हात करायला शिकवते. हे जर जमले तर उदरनिर्वाह आपोआप होतो. शिकवणारा शिक्षक शिक्षणाचा मुळ हेतू लक्षात घेऊन शिकवत असेल तर तो उत्तम शिक्षक म्हनवून घ्यायला पात्र असतो. असा उत्तम शिक्षक उत्तम विद्यार्थी घडवतो.

शिक्षणविषयक तक्रारींध्ये मोठी तक्रार आहे ती म्हणजे विद्यार्थ्यांचा दर्जा घसरलाय, शिक्षणाचाच दर्जा घसरलाय. इतर तक्रारी अहेत त्या म्हणजे विद्यार्थ्यांमध्ये ज्ञानलालसा नाही. नवनिर्मितीची क्षमता कमी आहे, त्यांनी घेतलेल्या शिक्षणाचा नोकरी-व्यवसायात वा समाजात थेट उपयोग होत नाही, शिक्षणाने बेरोजगारी दुर होत नाहीये इत्यादी. जशा तक्रारी जास्त आहेत , तसेच तक्रार करणारेही जास्त आहेत. येथे आठवते ती " हु मुव्ड माय चीझ?" ही कथा. बहुसंख्य तक्रार करणारे चीझ संपत आल्यानंतर निषेध करत, उपाय न शोधता उपासमारीने मरणार्‍या उंदरासारखे आहेत. फार दुर्मीळ प्रजाती आहे ती दुसर्‍या उंदराची. समस्येने खचून न जाता नवा मार्ग शोधणारी. याच दुर्लभ प्रजातीचा एक प्रतिनिधी हा लेख लिहितोय.

शिक्षक कोठे चुकले याची चिरफाड करण्याने शिक्षण सुधारणा होणार नाहीत. कारण चुकलंय ते शिक्षण. आग सोमेश्वरी लागली असेल तर उपाय रमेश्वराकडे करण्यासारखा प्रकार सध्या सुरू आहे. जर खरंच शिक्षणाविषयी तळमळ असेल तर शिक्षण कोठे चुकलॆ याचा प्रामाणिक, अभिनिवेशरहित, पुर्वग्रहरहित विचार व्हायला हवाय. आपल्या शिक्षणाचा असा खेळखंडोबा व्हायला कारण आहे ती आपण स्विकारलेली मेकॉलेची शिक्षण पद्धती. गुलाम राष्ट्राचे सांस्कृतिक व मानसीक खच्चीकरण करणा-या या पद्धतीचा विकास इंग्रज राज्यकर्त्यांना या देशावर पिढ्यानुपिढ्या राज्य करता यावे यासाठी केला गेला. देशाचा बौद्धीक विकास या पद्धतीचा हेतू कधी नव्हताच. बौद्धिक विकास घडवयचाच नसल्याने शिक्षकाला स्वबुद्धी वापरण्याची गरजच नव्हती. याचाच अर्थ शिक्षक बुद्धिमान हवा हा निकष कधी नव्हताच. म्हणुन या पद्धतीमुळे शिकवणे हे सोपे काम आहे असा समज बहुसंख्य शिक्षकांनी व इतर लोकांनी करून घेतला.

इंग्रजांनी लादलेल्या या शिक्षण पद्धतीचा मुळ उद्देश्य भारताचा कारभार हाकण्यासाठी पुरेशी लायकी असलेले मनुष्यबळ पुरवणे हाच होता. या खंडप्राय देशावर राज्य करायचे म्हणजे लिहिता वाचता येणार्‍यांची, हिशोब करू शकणा-र्‍यांची, आलेल्या आदेशांचा अर्थ लवून काम करू शकणार्‍यांची गरज होती. मेकॉलेने अशा गुलाम मनोवृत्तीच्या भारतीयांचे कारखाने ही शिक्षण-पद्धती वापरून निर्माण केले. या पद्धतीमध्ये बांधीव पाठ्यक्रम असतो. शिक्षक तो शिकवतो, शिकवल्यानंतर शिकणारा साचेबद्ध परिक्षा देतो. पाठांतरावर आधारीत प्रश्नांची जो अधिक अचुक- पुस्तकी- उत्तरे लिहीतो तो पास होतो. ज्याला पाठांतर व नंतर त्या पाठांतराचे लेखन जमत नाही तो मागे पडतो. कौशल्यविकास या पद्धतीत अपेक्षीत नाही. कारण कारकून वा कामगार जर स्वतंत्र बुद्धिने काम करु लागला तर ते सत्तेला जड जाते. साच्याचे कामगार घडवणारी ही यंत्रणा आपण स्वातंत्र्यानंतरही स्विकारली.

मेकॉलेच्या या पद्धतीत आवश्यक असणारे पाठांतर शिकवायला बुद्धी आवश्यक नसते. याच कारणाने ज्यांचे थोडेफार शिक्षण झाले आहे त्यांना शिक्षकांची नोकरी मिळवणे जड गेले नाही. पाठांतरच शिकवायचे असल्याने एकदा शिक्षक झाल्यावर ज्ञान वर्धनाची गरजच नव्हाती. या शिक्षकांना काम कमी असते त्याबद्ल्यात मोबदला मात्र बरा मिळतो. फावल्या वेळात वा कामाच्या वेळेत सुद्धा इतर व्यवसाय करून वरकमाई करता येते हे समाजाने बरोबर हेरले. मग याच स्वकार्यभाग साधाणार्‍या पुर्वसुरींच्या पावलांवर पाऊले टाकत डी. एड. करुन शिक्षक होऊन पाट्या टाकणार्‍यांची फळी तयार झाली. यांनी पाठांतरात तयार केलेले पुढे पदवीधर व त्यांच्यापुढचे द्विपदवीधर झाले. यांच्यातूनच माध्यमीक व महाविद्यालयीन शिक्षक घडले. सगळ्यांचा जोर पाठांतरावर. याच मंडळींनी मग पाठ्यक्रम घडवले. जे शिकवायला सोपे ते पाठ्यक्रमात सामील झाले. यातच व्यावसायीक अभ्यासक्रमांना महत्त्व आले. त्यांच्या प्रवेशासाठी गुणवाता जोखण्याचा मार्ग होता गुणपत्रक. अधिक गुण -प्रवेशाची व उत्तम भविष्याची खात्री. या समीकरणाने गुणांचे कारखाने उघडले ( वाचा लातूर पॅटर्न व कोचींग क्लासेस). कौशल्या विकास येथेच संपला. संकल्पना समजणे मागे पडले. ही आजची पिढी आहे. स्वतंत्र विचार
सलेली पिढी.

यावर उपाय काय? शिक्षक निवड करताना ज्यांच्याकडे स्वतंत्र प्रज्ञा आहे त्यांचीच निवड शिक्षक म्हणुन करा. शिक्षक अत्त्युत्तम असेल तरच तो उत्तम विद्यार्थी घडवतो. म्हणुन त्यांच्या निवडीसाठी पारदर्शक प्रक्रिया विकसित करा. वस्तुनिष्ठ चाळणी परिक्षा जी या भावी शिक्षकांच्या विषयज्ञान, शिकवण्याची व शिकण्याची इच्छा, आकलनक्षमता, शिक्षणप्रक्रियेचे ज्ञान, नवीन शिक्षण पद्धती अवलंबण्याची क्षमता, पडताळले जावे. यानंतर प्रत्यक्ष वर्गावर शिकवायला लावून शिकण्याचे कौशल्या जोखले जावे. या प्रक्रियेमधुन ताऊन सुलाखून बाहेर पडणारे हे शिक्षक संख्येने कमी असतील. असुदेत. कोणत्याही परिवर्तनाचा प्रारंभ असाच मंद असतो. या संख्येने कमी असलेल्या लायक शिक्षकांना शिक्षणाचा मुळ उद्देश शिकवा. कौशल्ये शिकवण्याचे स्वातंत्र्य व सृजनात्मक शिक्षणपद्धती विकसीत करण्यासाठी प्रोत्साहन द्या. हे केल्याबद्दल मान-सन्मान द्या. मग इतरांना त्यांचे अनुकरण करण्याची उर्मी येईल. कौशल्य शिकवणा-या शिक्षकांची संख्या वाढेल. आणि हा बदल कालपरत्वे पुढे झिरपत जाईल.

मुळापासून सुधारणा करणे गरजेचे आहे. फक्त टिका करणे सोपे असते. महाविद्यालयीन विद्यार्थ्याला शिकण्याची द्रुष्टी आलीली असते. पण नसतो तो अनुभव. शिक्षण अमर्याद आहे. यातील काय शिकावे व कसे शिकावे यासाठी प्राध्यापक असतो. तो शिक्षकच असतो. ब-याचदा विद्यार्थी त्याच्यापेक्षा जास्त बुद्धिमान असतात. शिक्षकाकडे जास्त असतो तो अनुभव. विषयातला तर असतोच त्याबरोबर विषायाशी संलग्न पण पुस्तकात नसलेल्या ब-याच संकल्पना त्याला अनुअभवाने उमगलेल्या असतात. विषयाचा वापर जगण्यासाठी कसा अरावा यचे ज्ञान त्याला आलेले असते. यामुळे तो शिकवू शकतो कसे शिकावे? असा प्राध्यापक पाठ्यक्रमाबद्दल विद्यार्थ्यांना मार्गदर्शन करतो. या मार्गदर्शनाखाली विद्यार्थी त्याच्या मगदुराप्रमाणे हे अमर्याद शिक्षण जितके जास्त परिणाकारकपणे घेता येइल तितके घेतो. त्याने मिळवलेल्या कौशल्यांची प्राध्यापक पडताळणी करतो. त्रूटी दुर करतो. आणखी काय करता येईल याचे जाण देतो. त्याला माहीती असते प्रत्येक विद्यार्थी वेगळा आहे. प्रत्येकाला वेगळ्या मर्गदर्शनाची, वेगळ्या प्रकारे मार्गदर्शन करण्याची गरज असते. त्याच्या मार्गदर्शनाखाली य विद्यार्थ्याची उत्क्रांती पुढच्या पिढ्या घडवणार्‍या शिक्षकामध्ये होते. पाठांतराधारीत परिक्षा या प्रक्रियेला गर्भातच मारतात. प्राध्यापक जिर्ण शिर्ण नोटस मधुन शिकवतो. विद्यार्थ्यांना जास्त गुण मिळावेत म्हणुन त्यांना नोट्स झेरॉक्स करून देतो. महत्त्वाचे प्रश्न सांगतो. अभ्यासक्रमाची झापडे लावतो. कायद्यांचा लावावा तसा पाठ्यक्रमाचा शब्द्च्छल करणारा अर्थ लावून तेव्हढेच घटवून घेतो व छापाचे सुबक गणपती घडवतो. हे छापाचे गणपती पदव्यांच्या पुंगळ्या व मेडलं मिरवत, जगण्याच्या बाजारात ठेचकाळायला व प्राध्यापकाला व शिक्षणालाच दोष द्यायला बाहेर पडतात. दोष मुळातून सुधारायला हवेत. पाठांतराधारीत परिक्षा बंद करून कौशल्याधारीत परिक्षा यायला हव्यात.

काही वेळेस साध्या साध्या गोष्टी समजायला अवघड जातात. अनेक शिक्षकांना सुद्धा कौशल्यविकास करायचा म्हणजे काय हे समजत नाही. उष्णतेने घनपदार्थ प्रसरण पावतात व उष्णता काढून घेतली की त्यांचे आकुंचन होते. ही झाली माहिती. एखाद्या भांड्याचे झाकण उघडत नसेल तर भांडे थंड करावे अथवा झाकण तापवावे हे झाले ज्ञान. त्याचा व्यवहारात वापर करून भांडे उघडणे हे झाले कौशल्य. वाचता येणे हे कौशल्य आहे. लिहिता येणे हे कौशल्य आहे. निबंध लिहीणे हे भाषीक कौशल्य आहे. आपण निबंध लेखणाचे काय केले? परिक्षेत गुण मिळावेत म्हणुन आपण निबंध पाठांतर करायला शिकवले. अनेक शिक्षक तर निबंधाच्या पुस्तकातून निबंध उतरवून आणायला सांगतात. काही शिक्षक निबंध फळ्यावर लिहुन देतात. विद्यार्थी त्यांच्या गृहपाठाच्या वहीत( या वहीला कव्हर असावे लागते, अक्षर चांगले असावे लागते, लिहिण्यातला निटनेटकेपण महत्त्वाचा असतो) हा निबंध घरून पक्का लिहून आणतात. तो दोनदा त्यांच्या हाताखालून जातो. तपासताना शिक्षकाला एक नजर टकून तपासता येतो, निबंध पुस्तकातला घेऊन जसाच्या तसा लिहिलेला असल्याने मजकुराची , भाषेची, विचारमांडणीची तपासणी करावी लागत नाही वेळ वाचतो. विद्यार्थ्याला परिक्षेत गुण मिळतात पण निबंधलेखन कौशल्याचे काय? गुणांना महत्त्व दिल्याने शिक्षकाचा भाषीक कौशल्य शिकवण्याचा अवघड खटाटोप वाचला.

गणितात तर आणखीच गंमत आहे. त्रिकोणमीतीचे काय करायचे याचे कोणालाच काही कळत नाही. क्षेत्रफळ काढणे पुस्तकातले वेगळे व व्यवहारातले वेगळे बनून जाते. हे विषय वर्गात शिकवण्याबरोबरच निसर्गात नेऊन शिकवावा लागतो. तोच प्रकार वनस्पती वा प्राणी शास्त्राचा. वनस्पतींचे विविध भाग शिक्षक विद्यार्थ्यांना वर्षातुन एकदा दाखवतो तेही बहुद्धा चित्रांच्या सहाय्याने. तो मुलांना त्याच्या पाहण्यातली उदाहरणे देतच नाही. पुस्तकातल्या बटाट्याचे डोळे पाहून विद्यार्थ्याला काही कळतच नाही. घरी जाऊन बटाटा बघायला कोणी शिकवतच नाही. बटाट्याच्या फोडी मातीत लावून डोळ्यांचे अंकुरणे अनुभवण्याचे तर दूरच. अशी अनेक उदाहरणे सांगता येतील. माझ्या एका सहका-याच्या मुलाने " होळी" या विषयावर फळ्यावरचा निबंध न लिहीता स्वतःच्या मनाने लिहिला म्हणुन त्याच्या शिक्षकाने त्याची निबंधवही भर वर्गात फेकुन दिल्याचे आठवते. या विद्यार्थ्यावर काय संस्कार झाले असतील? तो जर संवेदनशील असेल तर आयुष्यभर आता स्वतःचे विचार मांडू शकणार नाही. हे शिक्षकाने क केले असेल तर प्रत्येक मुलाला निबंधाचे गुण मिळावेत म्हणून.

गुणाधारीत मुल्यांकन चुकीचेच आहे. गुण या शब्दाच्या मुळ अर्थाचा विचार व्हावा. विद्यार्थी गुणवंत म्हणजे फक्त मार्क्सने नसावा तर त्याला त्याच्या वयाला अपेक्षीत कौशल्ये आत्मसात असावीत. गुणाधारीत मुल्यांकन बंद करा. कौशल्यांचा विकास व जोपासना करा तरच शिक्षण अर्थपुर्ण होईल. विद्यार्थ्याला शिक्षणाचा खरा फायदा तेव्हाच होईल.

Wednesday, 10 July 2013

प्रवीण गेडाम (IAS)...Dr.Pravin Gedam IAS

प्रवीण गेडाम (IAS)...Dr.Pravin Gedam IAS

Dr.Pravin Gedam a GOOD ADMINSTRATOR



या मथळ्याखाली "इंडिअन एक्स्प्रेस" या वर्तमानपत्राने ७ न. संपूर्ण पानावरच हि बातमी छापली होती.जळगाव पोलिसांकडे महापालिका आयुक्तांनी नोंदविलेला संपूर्ण "प्राथमिक माहिती अहवाल" (FIR ) अगदी जसाच तसा छापला होता.
एकदम start to end ...
या घटनेनंतर हा अधिकारी एकदम प्रकाशझोतात आला.सर्व सामान्य नागरिकांसाठी तर एकदम हिरोच बनला.सगळे विध्यार्थायंचे आकर्षण हा अधिकारी बनला.
पुण्यातील युनिक अकेडमी मध्ये "प्रिन्स व मनोहर नावाचे विध्यार्थी शिकत होते..
प्रिन्स ला सर्व अश्या क्लास वन अधिकार्यंची बरीच माहिती असे..
तेव्हा अकेदामिच्या नोटीस बोर्ड वर हि बातमी लावली गेली होती..सर्व विध्यार्थी कुतुहुलाने वाचत होते..प्रिन्स ने वाचली तेव्हा त्याच्याही चेहऱ्यावर टिपण्यासारखे भाव आले..
त्यामुळे मनोहर ने विचारले. "का रे प्रिन्स ओळखतो का यांना ?"
त्याचे उत्तर "हो,खूप चांगले ओळखतो !"
तो काही वेळ थांबून गंभीरतेने म्हणाला ..."हि तर फक्त सुरुवात आहे !"
त्याच्या बोलण्याला एक आधार होता. या व्यक्तिमत्वाने दापोलीमध्ये कार्यरत असताना फळ उत्पादन योजनेचा शेतामध्ये फिरून घेतलेला आढावा,काम झालेले दिसले तरच मजुरी देऊ हि घेतलेली भूमिका,या बाबी त्याला माहित होत्या..
शिवाय संगमनेरला असताना एकदम डेशिंगपने राबवलेली अतिक्रमण हटाव मोहीम..अवघ्या या दीड दिवसाच्या मोहीम मध्ये सर्व रस्ते पूर्ण मोकळे करण्यात आले..संगमनेरकर हि मोहीम कधीच विसरू शकणार नाही.
डॉ.प्रवीण गेडाम (जिल्हाधिकारी)
केंद्रीय लोकसेवा आयोगाच्या परीक्षेत मेडिकल सायन्स या वैकल्पिक विषयात ४१२ गुणाचे रेकोर्ड करून IAS झालेले व्यक्ती.सन २००२ ची हि घटना.आज ११ वर्षे उलटून गेली तरी हा रेकोर्ड कायम आहे..या एकाच विषयाने यांना थेट कलेक्टर केले.
हा विक्रम मेडिकल सायन्स या विषयाचा,पण हा विषय घेण्याची जबरदस्त हिमत मात्र या डॉक्टरची. हि हिमत करण्याच्या अगोदर मात्र अत्यंत लोकप्रिय असणारा इतिहास हा विषय घेऊन upsc दिली होती पण त्यात अपयश आले होते.
"दुसर्या प्रयत्नाच्या वेळी इतिहास का सोडला ?"
डॉ...."मला इतिहास हा विषय घायचा न्हवता.."
"मग घेतला कस काय ?"
डॉ...."सगळे घेतात म्हणून मी घेतला"

हा पहिला attempt दिल्य्वर इतिहास विषय घेऊन IAS होणे आपले काम नाही हि बाब लक्षत आली.
सगळे हातात घेतात म्हणून नव्हे तर आपल्याला जमेल ते विषय आपण दुसर्या attempt साठी घेऊ हा निर्धार केला व अमलात हि आणला..
विषय आवडणारा असेल आणि गुण देणारा नसेल किवा विषय गुण भरपूर देत नसेल पण अभ्यास करताना झोप येत नसेल तर काही उपयोग नाही,अस यांचे ठाम मत.

नागपूरच्या हडस हायस्कूलच्या एकदा वर्ग शिक्षकाने प्रत्येक विध्यार्थ्याला एक प्रश्न विचारला,,प्रश होता...
"मोठेपणी काय व्हायचे ?"
कोणाला डॉक्टर,कोणाला इंजिनिअर,कोणाला शिक्षक,कोणाला वकील तर कोणाला अगदी कंडक्टर होण्याची अपेक्षा असलेली उत्तर शिक्षकाला मिळाली..
फक्त एक उत्तर एकमेव होत..म्हणजे हे ..उत्तर एकाच मुलाने दिल म्हणून एकमेव...उत्तर होत...
"मला कलेक्टर व्हायचे आहे !"
शिक्षकांनी नाव विचारले,
"प्रवीण नीलकंठराव गेडाम" विध्यार्थी उत्तरला.

घडले मात्र उलटच..
डॉक्टर होण्याची इच्छा नसलेला हा विध्यार्थी बारावीला विज्ञान शाखेत उत्तम गुण आल्यामुळे MBBS कडे वळला.नागपूरच्या Govt . Medical College मधून १९९९ साली डॉक्टर होऊन बाहेर पडले..
डॉक्टर होण्याच्या या सहा वर्षाच्या प्रक्रियेत शालेय जीवनातील उत्तर मात्र विस्मृतीत गेल.पेशंट,एप्रन,स्थेस्कोप,इंजेक्शन,लस..इत्यादी शब्दांमध्ये यांच्या मधला कलेक्टर लोप पावला.
एका वेगळ्याच विश्वात हि स्वारी रममाण झाली.

पण या काळात एक घटना घडली..
मेडिकल कॉलेजच्या होस्टेलवर एक उत्तर भारतीय विद्यार्थी UPSC चा अभ्यास करायचा.हा विद्यार्थी प्रवीणचा होस्टेल मित्र. UPSC ची मोठी-मोठी पुस्तके घेऊन यायचा.."UPSC बहुत हार्ड होता हे ! बहुत पाध्ना पडता हे !" असे म्हणत सोलिड भाव खायचा.
बर्याच जणांनी UPSC करण्याची आकांश यांना भेटण्यानंतर सोडून दिली..
बघू तरी किती अवघड आहे ते ? म्हणत प्रविन्रव मात्र कामाला लागले.
जे होईल ते होईल...माज करू..एकच झिन्न..आणि फ़ोर्म भरला.

टार्गेट UPSC ...
हि घटना या डोकात्र्मध्ये कलेक्टर होण्याची इच्छा पुनर्जीवित करण्यास कारणीभूत ठरली.पूर्वी नमूद केल्या प्रमाणे पूर्व परीक्षेसाठी मेडिकल सायन्स या विषय ठरला..हा विषय घेऊन..दुसरा विषय ठरला इतिहास..
मेडिकल सायन्स गेली ६ वर्षामध्ये पूर्ण झालेला होता. UPSC साठी दोन विषयाची तयारी करावी लागते यांना मात्र एकाच विषयाची तयारी करावी लागली...तो म्हणजे इतिहास.
सन २००० या वर्षी सहज परीक्षेला बसले..ते सुधा राजस्थानातील जयपूर या परीक्षा केंद्रावर...कारण यावेळी पदव्युतर प्रवेश परीक्षेसाठी अभ्यास सुरु होता. UPSC पूर्व परीक्षा देण्यासाठी जयपूरला निघाल्यवर बेगमध्ये UPSC ची नाही तर MS (मास्तर ऑफ सर्जरी) साठी लागणारी पुस्तके होती.

यथावकाश MS साठी ओर्थोपेदिक व पेडीयात्रिक या दोन्ही शाखांमध्ये नंबर लागला.मुंबईमधील जे.जे.हॉस्पिटलच्या ग्रांड मेडिकल कॉलेज ला अडमिशन मिळाले...शिवाय सहज UPSC ची पूर्व परीक्षा पास झाले.पूर्वपरीक्षा झाल्यवर यथावकाश येथेच मुख्य परीक्षाही दिली..ती सहजच !
सहजच दिलेल्या पहिल्या प्रयत्नाचा रिझल्ट हि सहज लागला तोही "नापास" म्हणूनच..!

"गांभीर्याने प्रयत्न केल्यास आपण नक्की कलेक्टर होऊ",हि बाब मात्र सहज प्रयत्नाने उमजली.दुसरा प्रयत्न गांभीर्याने घेण्याचे ठरवल्यावर पहिला निर्णय घेतला तो "इतिहास" या विषयाला सोड्चीती देण्याचा. इतिहासाची जागा प्राणीशास्त्र (zoology ) विषयाने घेतली आणि प्रनिशास्त्रानेच यांना कलेक्टर करण्यचा इतिहास घडविला.मेडिकल सायन्स चा अभ्यास पूर्ण झाला असल्याने सामन्य अध्ययन दोन्ही पेपरवर लक्ष केंद्रित झाले..परिणामी सामन्य अध्यनाच्या दोन पेपरमध्ये मिळून ३४४ गुण आले..

तसं पाहता हा एकदम निवांत माणूस.अभ्यासाची पद्दत हि एकदम निवांत. परीक्षेसाठी म्हणून कधी अभ्यास केला नाही.नेहमी कोणताही विषय समजून घेण्यावर जास्त भर दिला..परीक्षा व त्याचे निकाल याचे कधीच टेन्शन घेतले नाही...
MBBS ला असताना अभ्यासावर कमी आणि जिम मध्ये शरीर काम्व्ण्यावर जास्त भर होता...
UPSC चा अंतिम निकाल लागला त्या दिवशीसुधा हि स्वारी निवांत झोपली होती.
अमित तेलंग ( IFS ) या मित्राने यादी पहिली...प्रवीण गेडाम...रेंक ३१ वी..
अमितने लगेच प्रवीणला फोन लावला व रिझल्ट सांगितला..गाढ झोपेत असल्याने प्रविनराव...ह...ह....करत एकूण घेतले व फोन आपटून ठेऊन दिला..
दोन-तीन तासांनी डॉक्टर अंथरुणावरून उठून बसले..."IAS झाल्याचे काय झक्कास स्वप्न पडले !" म्हणून स्वताशीच हसायला लागले...
स्वप्नात अमितची आठवण झाली म्हणून चला,अमितला फोन तरी करू म्हणत नंबर डायल केला..
अमितकडून पुन्हा तीच बातमी- "IAS झाल्यची"

आता मात्र काय कराव हे सुचत नव्हते..हे वास्तव का स्वप्न हेही काळात नव्हते..कसबसे मावसभावाचे होस्टेल गाठलं.स्वताला सावरत दोघांनी इन्टरनेट केफे गाठले. रिझल्टची एक प्रिंट घेतली....
१ पासून ३० पर्यंतची सगळी नाव खोडली...परत उलट्या क्रमाने ५० पासून ३२ पर्यंतची नवे खोडली.
आता विश्वास बसला..
डॉ.प्रवीण गेडाम- IAS हे वास्तव होत.

यानंतर पहिला फोन केला आईला....
"आई....आई...आई....sssss.....मी IAS झालो !"

 

'होतील बहु, असतील बहु पण या सम हाच' असेच वर्णन मावळते जिल्हाधिकारी डॉ.प्रवीण गेडाम यांच्याबाबत करावे लागेल.जळगाव व लातूरची जिल्हा परिषदेची कारकिर्द गाजवून डॉ.गेडाम हे उस्मानाबादला तीन वर्षापुर्वी उस्मानाबादला जिल्हाधिकारी म्हणून रूजू झाले होते.त्यावेळी लोकांनी मोठ्या अपेक्षा व्यक्त केल्या होत्या आणि अपेक्षा पुर्ण करण्यात डॉ.गेडाम यशस्वी ठरले आहेत.
डॉ.गेडाम यांनी सर्वप्रथम बेशिस्त बनलेल्या महसूल यंत्रणेला शिस्त लावली.त्यानंतर त्यांनी गोरगरिबांच्या अन्नावर गदा आणणा-या स्वस्त धान्य दुकानदारांविरूध्द मोहिम उघडली.बोगस शिधा पत्रिकेला आळा घातला.त्यामुळे गोरगरिब जनतेला स्वस्त धान्य दुकानात धान्य व रॉकेल मिळू लागले.त्यानंतर त्यांनी दहावी, बारावी परिक्षेत चालणा-या कॉपीला आळा घालण्यासाठी कठोर पाऊले उचलली.
सर्वात लक्षवेधी काम तुळजापूरच्या तुळजाभवानी तिर्थक्षेत्राच्या ठिकाणी केले.तुळजापूरला ३७० कोटी रूपयाचा तिर्थक्षेत्र विकास आराखडा मंजूर झाल्यानंतर त्याची काटेकोर अंमलबजावणी होणे गरजेचे होते.रस्ते रूंद करणे, विविध इमारती बांधणे, भाविकांसाठी विविध योजना राबविणे गरजेचे होते.डॉ.गेडाम यांनी अत्यंत प्रामाणिकपणे आपले काम केले.त्याचबरोबर तुळजाभवानी मंदिरात पुजा-यांची जी दादागिरी चालू होती, तीही त्यांनी हाणून पाडली.मंदिरात चालणारा विविध भ्रष्टाचारालाही लगाम घातला.तुळजाभवानी मंदिराची जमिन काही लोकांनी लाटली होती, तीही काढून घेण्याचा प्रयत्न केला.
त्याचबरोबर अनेक पुढा-यांनी व शिक्षण सम्राटांनी शासकीय जमिनींचा गैरवापर करून, भुखंडाचे श्रीखंड केले होते.त्यावरही डॉ.गेडाम यांनी जाता - जाता हिवराची मेख मारली.त्यांच्या तीन वर्षाच्या कारकिर्दीत सर्वसामान्य जनता अत्यंत खूष होती.असा जिल्हाधिकारी आम्ही पाहिला नव्हता, अश्याच प्रतिक्रिया उमटत होत्या.त्यांच्या कारकिदीत जी शासकीय नोकर भरती झाली, ती अत्यंत पारदर्शक होती.त्यांच्याकडे तक्रार घेवून जाणारा व्यक्ती निश्चितच समाधानी होत होता.जिल्हाधिकारी म्हणून त्यांनी जो आपला कामाचा ठसा उमटाविला आहे, तो यापुर्वी कोणीच उमटाविला नाही.जिल्हाधिकारी पदाची किंमत ख-या अर्थाने जनतेला कळाली होती.त्यांच्या मोहिमेमुळे भ्रष्ट पुढारी व कामचुकार कर्मचारी धास्तावले होते.
त्यांची बदली करू नये, त्यांना आणखी एक वर्षाची मुदतवाढ द्यावी, अशी मागणी अनेक सामाजिक संघटनांनी करूनही शासनाने त्यांची पुण्याला बदली केली.त्यांच्या बदलीमुळे काही मुठभर पुढारी आनंदीत झाले असले तरी, बहुतांश जनता नाराज आहे.जनतेत एक प्रकारची संतापाची लाट निर्माण झाली आहे.
असो, डॉ.गेडाम यांनी उस्मानाबादला जे काम केले, ते जनता कधीच विसरू शकत नाही.जिल्ह्यातील जनता हमेशा त्यांना मिस् करेल, यात शंका नाही.

*स्वत:च्या घरी टँकर न मागविणारा जिल्हाधिकारी...
उस्मानाबाद शहर व जिल्ह्यात एप्रिल, मे मध्ये भीषण पाणीटंचाई होती.जिल्ह्यात अनेक गावात टँकरने पाणी पुरवठा चालू होता. हे टँकर सुरू करण्याचे अधिकार जिल्हाधिका-यांना आहेत.
उस्मानाबादेतही आठ दिवसांतून एकदा नळ पाणी पुरवठा चालू आहे.त्यामुळे अनेकांना पाणी टंचाईला तोंड द्यावे लागत आहे.या पाणी टंचाईची झळ दस्तुरखुद्द जिल्हाधिकारी डॉ.प्रवीण गेडाम यांनाही बसली.त्यांच्या बंगल्यात कुपनलिका आहे, मात्र त्याचे पाणी कमी झाले आहे.नळाला तर आठ दिवसांतून एकदा पाणी येते.त्यांच्या घरात पाणी टंचाई आहे.मनात आणले असते तर ते दररोज टँकरने पाणी मागविले असते.मागील जिल्हाधिकारी पाणी टँचाईच्या काळात टँकर मागवत असत.मात्र डॉ.गेडाम यांनी कधीच टँकर न मागवता, आहे त्या पाण्याची बचत करून दिवस काढले.
ही काही काल्पनिक गोष्ट नाही तर सत्यता आहे.डॉ.गेडाम यांच्या मातोश्री लक्ष्मीकमल गेडाम या प्रसिध्द लेखिका व गीतकार आहेत.त्यांच्या निसर्ग हिंदोळा या गीताच्या सीडीच्या वेळी त्यांच्या घरी जाण्याची संधी मिळाली, तेव्हा ही अनुभूती आली.
आई लक्ष्मीकमल यांना पाणी टंचाईबाबत विचारले असता, त्यांनी याबाबत प्लीज पेपरात लिहू नका, असे आम्हाला बजावले होते.मात्र आम्हाला राहवत नाही, म्हणून ही वस्तुस्थिती लिहित आहे.यावरून स्पष्ट होते की, जिल्हाधिकारी डॉ.गेडाम किती आपल्या कामाशी प्रामाणिक होते.त्यांनी आपल्या पदाचा कधीच गैरवापर केला नाही.असा जिल्हाधिकारी उस्मानाबादला लाभला, हे उस्मानाबादकरांचे नशिबच समजावे लागेल.

* नव्या बंगल्याचे कामही थांबविले
उस्मानाबाच्या जिल्हाधिका-यांचा संध्याचा बंगला खूप पुरातण आहे.त्यामुळे आहे त्या बंगल्याजवळ नव्या बंगल्याचे काम गेल्या काही महिन्यापासून चालू आहे.मात्र पाणी टंचाईमुळे या बंगल्याचे काम काही महिन्यापुर्वी थांबविण्यात आले आहे.
हा या नव्या बंगल्यात पहिला प्रवेश डॉ.गेडाम यांचा होईल, असे वाटले होते,मात्र याचा हव्यास डॉ.गेडाम यांना नव्हता.अन्यथा टँकरने पाणी आणून या बंगल्याचे काम मागेच पुर्ण करता आले असते.

डॉ.गेडाम यांना उस्मानाबाद लाइव्हचा मानाचा मुजरा...

हेच फळ का ?
डॉ.प्रवीण गेडाम यांनी उस्मानाबादला तीन वर्षे जिल्हाधिकारी म्हणून अत्यंत चांगले काम केले.त्यांच्या कामावर उस्मानाबादची जनता अत्यंत खूष होती.मात्र कर्तव्यदक्ष जिल्हाधिकारी डॉ.गेडाम यांना नाउमेद करण्याचे काम राज्य सरकारने केले आहे.त्यांची भूजल सर्व्हेक्षण खात्याचे संचालक म्हणून पुण्याला बदली करण्यात आली आहे.हे कार्यालय अत्यंत छोटे असून, काम करण्यास कसलाच वाव नाही.उस्मानाबादला चांगले काम केलेले हेच फळ का, असा प्रश्न कधी- कधी पडत आहे.त्यांची अन्यत्र जिल्हाधिकारी म्हणून बदली झाली असती तर, त्यांनी आपली झलक आणखी दाखविली असती...मात्र राज्यकर्त्यांना ते नको आहे....

Monday, 1 July 2013

शिक्षणव्यवस्थेची मूल्याधारित पुनर्रचना आवश्यक !

शिक्षणव्यवस्थेची मूल्याधारित पुनर्रचना आवश्यक !


आपल्या गुणाधारित शिक्षणव्यवस्थेमुळे प्रत्येक विषयात उत्तीर्ण होणे अनिवार्य ठरते हे आपण पाहिले. या व्यवस्थेचा सर्वात मोठा दोष म्हणजे विद्यार्थी हा घोकंपट्टी करणारा भारवाही हमाल बनुन जातो व त्याची नैसर्गिक कौशल्ये/कल दुर्लक्षित राहतात. यातुनच नवनिर्मितीची क्षमता क्रमश: घटवली जाते. भारतियांत नवनिर्मितीची क्षमता नव्हती म्हणुन आपण ज्ञानविज्ञानात मागे पडलो ते पडलोच याबाबत आपण मागील लेखात चर्चा केली. भारतीय एकुणातीलच व्यवस्थेने नवनिर्माण क्षमतेचे मानसिक अपहरण केले होते हेही आपल्या सहज लक्षात येईल. दैववाद हे त्याचे कारण नसून प्रत्येक समाजघटकातील मुलांना आधी पोटार्थीच कसे बनवता येईल अशी शिक्षणपद्धती व मूल्यपद्धती जोपासली गेली असल्याचे आपल्या लक्षात येईल.

आपला पुरोहितवर्गही "भिक्षुक" म्हणुन अभिमानाने मिरवत असे तर इतरजण बालवयापासुनच परंपरागत धंद्यांत आंधळेपणे ढकलले जात असत. यात प्रत्येकात कोणत्या ना कोणत्या नवनिर्मितीची क्षमता असली तरी तशी संधी मिळणे अशक्यप्रायच होते! स्वतंत्र विचार करण्यासाठी अर्थव्यवस्था अनुकूल अथवा प्रतिकूल ठरू शकतात हे आपण जागतिक इतिहासात डोकावून पाहिले तरी लक्षात येईल. दहाव्या शतकानंतरची भारतीय अर्थव्यवस्था आणि तत्पुर्वीची अर्थव्यवस्था व नवनिर्मिती यात आपण तुलना केली तर हा मुद्दा सहज लक्षात येइल.

वर्तमान युगात आपल्या शिक्षणपद्धतीने खरे तर इतिहासापासून धडा घेत स्वतंत्र विचार करु शकणारी, नवनिर्मितीची प्रेरणा केंद्रीभुत ठेवत ज्ञानाधारित शिक्षणव्यवस्था अंगिकारणे आवश्यक होते. दुर्दैवाने तसे झाले नाही. उलट आपली शिक्षणव्यवस्था ही बेरोजगार निर्मितीचे मोठे कारखाने बनले. बेरोजगार शिक्षितांकडे दुसरे जगण्याचे कौशल्यच शिक्षणपद्धतीने दिले नसल्याने सुशिक्षितापेक्षा अशिक्षितांतच जगण्याची कौशल्ये अधिक आढळतात असे शिक्षणतज्ञच म्हणत असतील तर यावर गांभिर्याने विचार करण्याची गरज आहे.

सुरुवातीलाच म्हटल्याप्रमाणे गुणाधारित शिक्षणपद्धती निर्मितीक्षमतेला मारक आहे हे उघड आहे. उदा. माझा कल वा आवड इतिहासाकडे आहे व मला गणितात अथवा विज्ञानात गती नाही. अशा परिस्थितीत मी गणित अथवा विज्ञान शिकणे व त्यात पास होणे अनिवार्य असावे काय? समजा मारुन मुटकून घोकंपट्टी करत मी त्यात पास जरी झालो तरी त्याचा, मला कसलेही आकलनच झाले नसल्याने, भावी जीवनात काही उपयोग आहे काय? मला सोडा त्या आकलनरहित अवस्थेत जेही विषय पास झालो त्यांत मी त्यात अधिकची भर घालत समाजाला उपयोगी बनू शकतो काय? यात माझे जी आवड, इतिहास, त्याचे काय होईल? इतर विषयांत पास होण्याच्या दडपणाखाली मला नाईलाजाने इतिहासाकडे दुर्लक्ष करावे लागणार नाही काय? म्हणजे ज्यात मला आवड आहे त्यात मला अधिकाधिक प्राविण्य (अगदी शिक्षणपद्धतीत दिलेल्या पाठ्यक्रमाबाहेर जात) मिळविण्याची संधी मिळणार आहे काय? त्या आवडीच्या विषयावर अधिक चिंतन मनन आणि नवा दृष्टीकोन स्वतंत्रपणे जोपासण्याची मला या पद्धतीत संधी आहे काय? या पद्धतीत माझा आणि शिक्षकांचा वेळ/परिश्रम व शासन (आणि माझे पालक) खर्च करत असल्याने तो खर्च ज्यात मला रस नाही त्यावर वाया घालविण्यासारखे नाही काय?

हे इतिहासाचे उदाहरण सर्वच विषयांबद्दल लागू आहे. पाठ्यक्रमाबाहेर असलेल्या पण जगण्याची साधने असलेल्या विषयांत...म्हणजे चित्रकला, लोहारकाम, कृषिशास्त्र, सुतारकाम इ. मद्धे एखाद्याला रुची असेल वा अंगभूत कौशल्य असेल तर ते कौशल्य प्राविण्यात बदलवत विद्यार्थ्याला त्यात तज्ञ बनवण्यासाठी अनुकूल अशी आपली शिक्षणव्यवस्था आहे काय?

एक अथवा दोन आवड असलेल्या विषयांतच संधी देत, पास होण्याची त्या विषयांची मर्यादा वाढवत अन्य विषयांतील गुण कितीही कमी अथवा जास्त असले तरी विद्यार्थ्याला पुढील वर्गात पाठवले तर काय अनर्थ होणार आहे काय?

हे प्रश्न अशासाठी विचारले कि यावर गंभीरपणे चिंतन करण्याची गरज आहे. यात असा प्रतिप्रश्न उपस्थित होवू शकतो तो हा कि विद्यार्थ्याचा नेमका कल कसा ठरवायचा? आज ज्या विषयाची आवड वाटते त्याची आवड पुढेही राहिलच हे कशावरुन?

तसेही आता सातवीपर्यंत विद्यार्थी पास होण्याचा तणाव नसल्याने निर्धास्त असतात. या सात वर्षांच्या कालावधीत विद्यार्थ्याचा कल, आवड, जिज्ञासा नेमकी कोणत्या विषयात आहे हे शिक्षकांना (व पालकांनाही) समजणे अशक्य नाही. त्याला मानसशास्त्रीय चाचण्यांचीही जोड देता येवू शकते. याच काळात ज्यात कल वाटतो त्या विषयांत अधिकचे (अभ्यासक्रमाबाहेर जात) स्वातंत्र्यही देता येवू शकते. शेवटच्या परिक्षेत कल असलेल्या विषयांतील मार्कच गृहित धरुन त्याला त्याच विषयात (अथवा एकापेक्षा अधिक विषय असतील तर निवदसंधी देत) माध्यमिक, उच्चमाध्यमिक व पदवी शिक्षण दिले तर काय होइल?

याचा सर्वात मोठा फायदा हा होईल कि विद्यार्थी आपल्या आवडीच्या क्षेत्रात पदवी वयातच एरवी आपल्या शिक्षणव्यवस्थेत अशक्य आहे असे अधिकचे प्राविण्य मिळवू शकेल. तज्ञ बनू शकेल. त्यातुनच नवनिर्मितीला वाव मिळु शकतो आणि देशात विविध विषयांतील व त्यांच्या शाखा-उपशाखांतील पारंगत अशा तज्ञांच्या फौजा उभ्या राहू शकतात हे आपण लक्षात घेतले पाहिजे.

या पद्धतीचा होणारा संभाव्य पण सर्वात महत्वाचा फायदा असा कि विद्यार्थ्याला एक स्वतंत्र व्यक्तिमत्व म्हणुन आपली बांधणी करता येणे सहज शक्य आहे. प्रचलित शिक्षणपद्धतीत प्रत्येक विद्यार्थी हा मानसिक कुंठेतून अपरिहार्यपणे जात असतो. केवळ गरजेपोटी जेंव्हा नको ते विषयही अभ्यासावेच लागतात, अधिकाधिक गुण मिळवत इतरांशीच्या स्पर्धेत अविरत संघर्षायमान रहावे लागते तेंव्हा मानवी व्यक्तिमत्वाचे आकुंचन होत विकासशील नव्हे तर स्पर्धाधारित नागरिक निर्माण होणे अपरिहार्य आहे. यातुन जी समाजव्यवस्था (राजकीय/आर्थिक/बौद्धिक) आकाराला येते ती तशीच संकुचित व परस्परांकडे स्पर्धेच्या भावनेने पिडीत झाल्याने नकारात्मक असते. आणि नकारात्मक मनोवृत्तीच्या समाजात नवनिर्मिती कशी होणार? विद्यार्थीदशेतच काय शिकायचे आहे याचे विद्यार्थ्याचे स्वातंत्र्य नाकारले जात असेल तर कोणत्या स्वतंत्र व्यक्तिमत्वाचे नागरिक आम्ही घडवणार आहोत?

आज शिक्षण पुर्ण होऊनही विद्यार्थ्यांना नोक-यांसाठी स्पर्धा परिक्षा का द्याव्या लागतात? याचाच अर्थ आधी जे काही शिकले, मेरिटचे गुण मिळवले ते निरर्थक होते असे आम्हीच मान्य करतो असे नव्हे काय? दोनशे जागांसाठी दोन लाख अर्ज हा सध्याचा सरासरी नोकरी मागणारे आणि उपलब्ध नोक-या यांतील अवाढव्य तफावत दर्शवत नाही काय? या परिक्षा, त्यांतील नेहमीचे गोंधळ व जीवघेणी स्पर्धा यातून आपण निकोप समाज घडवत नसून हिंस्त्र आणि स्वार्थप्रणित नागरिक घडवत असतो असे नव्हे काय? जीवनाची श्रेष्ठ मुल्ये या निरर्थक स्पर्धात्मकतेमुळे हरपतात व आज आपली जी भ्रष्ट व्यवस्था उभी राहिलेली आहे तिला आपली शिक्षणव्यवस्थाच कारणीभूत नव्हे काय?

या जगात स्कोप नाही असा विषय नाही. एखाद्या क्षेत्रात संध्यांची निर्माण होणारी लाट ही चिरकालिक नसून तात्पुरती असते. त्यामुळे जे अशा लाटांवर स्वार आधी होतात ते फायद्यात जात असले तरी नंतरच्या झुंडी मात्र क्रमश: कशा तोट्यात जावू लागतात हे आपण आय.टी. क्षेत्राबाबतही पाहू शकतो. बरे या झुंडी स्वत:चे असे काही नवयोगदान देण्याच्या स्थितीत असतात काय? याचे उत्तर जवळपास नाही असेच असते...कारण तसे प्राविण्य त्याच्याकडे नसतेच.अशा शिक्षनपद्धतीत फक्त नोक-या मागणारे अधिक असतात तर नोक-या निर्माण करु शकणारे अत्यल्प. या परिस्थितीत राष्ट्राचा अर्थविकास होणे कसे शक्य आहे? ज्ञानविकासाची मग बातच नको!

त्यामुळे आपल्याला आपल्या शिक्षणपद्धतीचा फेरविचार करणे अनिवार्य असे बनले आहे. प्रत्येक मूल हे एक स्वतंत्र व्यक्तिमत्व आहे व त्याचे स्वत:चे असे विकसित होवू शकणारे स्वतंत्र ज्ञानविषय आहेत हे मानसशास्त्रीय भान आपल्याला येणे अत्यावश्यक आहे. त्याचे भान ठेवतच तशी शिक्षणपद्धती बनवली गेली पाहिजे. राबवली गेली पाहिजे!

अन्यथा भारत ज्ञानकारणापासून ते अर्थकारणापर्यंत आजवर ज्या भिक्षुकी अवस्थेत आहे त्यात पुढेही विषेष फरक पडणार नाही. जाग येईल तोवर आपली साधनसंपत्ती जवळपास नष्ट झाली असेल व आर्थिक दृष्ट्या आपण पुन्हा अराजकाने हिंस्त्र बनलेल्या मध्ययुगात फेकले गेलेलो असू याचे भान आपल्याला वेळीच आले पाहिजे.

Friday, 28 June 2013

" भारतरत्न " - देशातील सर्वोच सन्मान



 " भारतरत्न " - देशातील सर्वोच सन्मान

Bharat Ratna Recipients
List of Bharat Ratna Recipients
S.No
Name
Year Awarded
Contributions
1
Chakravarti Rajagopalachari
1954
Freedom Fighter, Last Governor-General of India
2
C. V. Raman
1954
Physicist, Nobel Laureate
3
Sarvepalli Radhakrishnan
1954
Philosopher, second President of India
4
Bhagwan Das
1955
Freedom fighter, author
5
Mokshagundam Visvesvarayya
1955
Civil engineer, Diwan of Mysore
6
Jawaharlal Nehru
1955
Freedom fighter, author, first Prime Minister of India
7
Govind Ballabh Pant
1957
Freedom fighter, Chief Minister of Uttar Pradesh, Home Minister
8
Dhondo Keshav Karve
1958
Educator, social reformer
9
Bidhan Chandra Roy
1961
Physician, Chief Minister of West Bengal
10
Purushottam Das Tandon
1961
Freedom fighter, educator
11
Rajendra Prasad
1962
Freedom fighter, jurist, first President of India
12
Zakir Hussain
1963
Scholar, third President of India
13
Pandurang Vaman Kane
1963
Indologist and Sanskrit scholar
14
Lal Bahadur Shastri
1966
Posthumous, Freedom fighter, second Prime Minister of India
15
Indira Gandhi
1971
Fourth Prime Minister of India
16
V. V. Giri
1975
Trade unionist and fourth President of India
17
K. Kamaraj
1976
Posthumous, Freedom fighter, Chief Minister of Madras State
18
Mother Teresa
1980
Catholic nun, founder of the Missionaries of Charity
19
Vinoba Bhave
1983
Posthumous, social reformer, Freedom fighter
20
Khan Abdul Ghaffar Khan
1987
First non-citizen to receive the Bharat Ratna, Freedom fighter
21
M. G. Ramachandran
1988
Posthumous, film actor, Chief Minister of Tamil Nadu
22
B. R. Ambedkar
1990
Posthumous, chief architect of the Indian Constitution, politician, economist, and scholar
23
Nelson Mandela
1990
Second non-citizen and first non-Indian recipient, Leader of the Anti-Apartheid movement
24
Rajiv Gandhi
1991
Posthumous, Seventh Prime Minister
25
Vallabhbhai Patel
1991
Posthumous, Freedom fighter, first Home Minister
26
Morarji Desai
1991
Freedom fighter, fifth Prime Minister
27
Abul Kalam Azad
1992
Posthumous, Freedom fighter, first Minister of Education
28
J. R. D. Tata
1992
Industrialist and philanthropist
29
Satyajit Ray
1992
Bengali filmmaker
30
A. P. J. Abdul Kalam
1997
Aeronautical Engineer,11th President of India
31
Gulzarilal Nanda
1997
Freedom fighter, interim Prime Minister
32
Aruna Asaf Ali
1997
Posthumous, Freedom fighter
33
M. S. Subbulakshmi
1998
Classical Carnatic singer
34
Chidambaram Subramaniam
1998
Freedom fighter, Minister of Agriculture
35
Jayaprakash Narayan
1999
Posthumous, Freedom fighter and politician
36
Ravi Shankar
1999
Sitar player
37
Amartya Sen
1999
Economist
38
Gopinath Bordoloi
1999
Posthumous, Freedom fighter, Chief Minister of Assam
39
Lata Mangeshkar
2001
Playback singer
40
Bismillah Khan
2001
Hindustani classical shehnai player
41
Bhimsen Joshi
2008
Hindustani classical singer