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Monday, 29 July 2013

संसद.. Parliament..

संसद..Parliament..

 एक नजर हमारे पूरे संसद और उसकी सभी कार्यप्रणाली पर !

 

Part 1 -  Part 2 -  Part 3 - Part 4 -

 


संसद,केन्द्र सरकार का विधाय अंग हे. संसदीय प्रणाली,जिसे सरकार का वेस्टमिस्तर माडल भी कहते हे,अपनाने के कारण भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था मे संसद एक विशिष्ट व केन्द्रीय स्थान रखती है .
संविधान के पाचवे भाग के अंतर्गत अनुच्छेद ७९ से १२२ मे संसद के गठन ,संरचना,अधिकारियो,प्रक्रिया,विशेषाधिकार,व श्क्ति आदि के बारे मे वर्णन किया गया है. 

संसद का गठन-

               संविधान के अनुसार भारत की संसद के तीन अंग है- राष्ट्रपति,लोकसभा व राज्यसभा . १९५४ मे राज्य परिषद एव जनता का सदन के स्थान पर क्रमश; राज्यसभा एव लोकसभा शब्द अपनाया गया। राज्यसभा ,उच्च सदम कहलाता है जबकि लोकसभा निचला सदन कहलाता है। राज्यसभा मे राज्य व संघ राज्य शेट्रो के प्रतिनिधि होते है, जबकि लोकसभा सम्पूर्ण रूप मे भारत के लोगो का प्रतिनिधितव करती है।

हालाकी राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है और न ही वह संसद मे बैठता है। लेकिन राष्ट्रपति ,संसद का अभिन्न अंग है। एसा इसलिये है क्योकी संसद के दोनो सदनो द्वारा पारित कोई विधेयक तब तक विधि नहीं बंटा ,जब तक राष्ट्रपति उसे अपनी अधिकृति न देता। राष्ट्रपति,संसद के कुछ चुनिंदा कार्य भी करता है।उदाहरण स्वरूप -राष्ट्रपति दोनो सदनो का सत्र आहूत करता है। याफिर सत्रावसान करता है। वह लोकसभा को विघटित कर सकता है। जब संसद का सत्र न चल रहा हो, वह अध्यादेश जारी कर सकता है आदि।

इस मामले मे भारतीय संविधान ,अमेरिका के स्थान पर ब्रिटेन की पद्धति पर आधारित है। ब्रिटेन की संसद ताज (राजा या रानी) ,हॉउस ऑफ लॉर्ड व हॉउस ऑफ कॉमन्स से मिलकर बनती है। इसके विपरीत,अमेरिका राष्ट्रपति विधानमंडल का महतवपूर्ण अंग नहीं है। अमेरिका विधानमंडल के कॉंग्रेस के नाम से जाना जाता है। कॉंग्रेस के अंतर्गत सीनेट ,हॉउस ऑफ रीप्रेसेन्टिव होते है।
सरकार की संसदीय पद्धति मे विधाय व कार्यकारी अंगो मे परस्पर निर्भरता पर जोर दिया जाता है। अंत; हमारे संसद मे राष्ट्रपति ,ब्रिटेन की संसद मे ताज की तरह है। वह दूसरी तरह, राष्ट्रपति पद्धति वाली सरकार मे विधाय और कार्यकारी अंगो को अलग करने पर जोर दिया जाता है। इसीलिये अमेरिका राष्ट्रपति,कॉंग्रेस का घटक नहीं माना जाता है।

दोनो सदनो की संरचना-  


राजसभा की संरचना:
                    राज्यसभा की अधिकतम सांख्या २०५ निर्धारित है। इनमे मे २३८ सदस्य राज्यो व संघ राज्यो शेत्र के प्रतिनिधि (अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित) होंगे, जबकि १२ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोमित किये जायेंगे।
वर्तमान मे राज्यसभा मे २४५ सदस्य है।इनमे २२९ सदस्य राज्यो का प्रतिनिधितव करते है,४ संघ राज्य शेत्र का प्रतिनिधितव करते है और १२ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोमित है।
संविधान की चौथी अनुसूची मे राज्यसभा के लिये राज्यो व संघ ष्ट्र मे सीटो के आवंटन का वर्णन किया है।
१) राज्यो का प्रतिनिधितव:
                      राज्यसभा मे राज्यो के प्रतिनिधि का निर्वाचन राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य करते है। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधितव पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। राज्यसभा के लिये राज्यो की सीटो का बंटवारा उनकी जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। इसलिये राज्यो के प्रतिनिधीयो की सांख्या अलग-अलग राज्यो मे अलग होती है। उदाहरण स्वरूप- उत्तर प्रदेश से ३१ सदस्य है जबकि त्रिपुरा से १ सदस्य है। अमेरिका मे "सीनेट" मे राज्यो का प्रतिनिधितव बराबर होता है (जनसंख्या के आधार पर नहीं). हालांकि अमेरिका मे,जनसंख्या के स्थान पर सभी राज्यो को सीनेट मे समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। अमेरिकी सीनेट मे कुल १०० सीटे है तथा प्रटेक राज्य को २ सीटे प्राप्त है।

२) संघ राज्य शेत्र का प्रतिनिधित्व:
                             राज्यसभा मे संघ राज्यशेत्र का प्रटेक प्रतिनिधि इस कार्य के लिये निर्मित एक निर्वाचक मंडल स्वारा चुना जाता है। यह चुनाव भी  आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। ७ संघ राज्य शेत्र मे से सिर्फ २ (दिल्ली व पद्डुचेरी) के प्रतिनिधि राज्यसभा मे है। अन्य पांच संघ शासित प्रदेशो की जनसख्या तुलनात्मक रूप से काफी काम होने के कारण राज्यसभा मे उन्हे अलग प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।

३) नामित या नाम निर्देशित सदस्य:
                              राष्ट्रपति,राज्यसभा मे १२ एसे सद्स्यो को नामित या नाम निर्देशित करता है। जिन्हे कला ,साहित्य,विज्ञान और समाजसेवा ,विषयो के सम्बंध मे विशेष ज्ञान या व्यवहारिक अनुभव हो। एसे व्यक्तियो को नामांकित करने के पीछे उद्देश् है की, नामी या प्रसिध व्यक्ति बिना चुनाव के राज्यसभा मे जा सके। यहा यह ध्यान देने वाली बात है की अमेरिकी सीनेट मे कोई नामित सदस्य नहीं होता है।

लोकसभा की संरचना:
                     लोकसभा की अधिकतम सांख्या ५५२ निर्धारित की गयी है। इनमे से ५३० राज्यो के प्रतिनिधि ,२० संघ राज्य शेत्र के प्रतिनिधि होते है। एगलो-इंडियन समुदाय के दो सद्स्यो को राष्ट्रपति नामित या नाम निर्देशित करता है।
                    वर्तमान मे लोकसभा मे ५४५ सदस्य है। इनमे से ५३० सदस्य राज्यो से, १३ सदस्य संघ राज्य शेत्र से और दो सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित या नाम निर्देशित एंग्लो-इंडियन से है।

१) राज्यो का प्रतिनिधित्व:            
                    लोकसभा मे राज्यो के प्रतिनिधि राज्यो के विभिन्न निर्वाचन ष्ट्र के लोगो द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते है। भारत के हर नागरिक को जिसकी उम्र १८ वर्ष से अधिक है और जिसे संविधान या विधि के उपबंधो के मुताबिक अयोग्य नहीं ठहराया गया हो, मत देने का अधिकार है। ६१वे संविधान संशोधन अधिनियम , १९८८ द्वारा मत देने की आयु सीमा को २१ वर्ष से घटकर १८ वर्ष कर दिया।

२) संघ राज्यशेत्र का प्रतिनिधित्व:
                            संविधान से संसद के संघ राज्यष्त्र के प्रतिनिधीयो को चुनने की विधि के निर्धारण का अधिकार दिया है। इसी के तहत संसद ने संघ राज्य शेत्र अधिनियम १९६५ बनाया, जिसके तहत संघ राज्य शेत्र से प्रत्यक्ष निर्वाचन के तहत लोकसभा के सदस्य चुने जाते है।

३) नामित या नाम निर्देशित सदस्य:
                              अगर एंग्लो-इंडियन समुदाय का लोकसभा मे पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो, तो राष्ट्रपति इस समुदाय के दो लोगो को नामित या उनका नाम निर्देशित कर सकता है। शुरुवात मे या उपबंध १९६० तक के लिये थी लेकिन ७९वे संविधान संशोधन अधिनियम १९९९ मे इस उपबंध को २०१० तक के लिये बढ़ा दिया गया।
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Sunday, 28 July 2013

संसद..Parliament..-भाग २

 संसद..Parliament..

 एक नजर हमारे पूरे संसद और उसकी सभी कार्यप्रणाली पर !

 भाग २ 



Part 1 - Part 2 - Part 3 - Part 4-


लोकसभा की चुनाव प्रणाली-
                       लोकसभा चुनाव प्रणाली से संबंधित पहलू इस प्रकार है-

प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र :
                                      लोकसभा के लिये प्रत्यक्ष निर्वाचन करने के लिये सभी राज्यो को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रो मे विभाजित किया गया है। इस सम्बंध मे संविधान ने दो उपबंध बनाये है।

1) लोकसभा मे सीटो का आवंटन प्रटेक राज्य को ऐसी रीति से किया जायेगा की स्थानो की सांख्या से उस राज्य की जनसंख्या का अनुपात sabhi राज्यो के लिये यथा साध्य एक ही हो।  यह उपबंध उन राज्यो पर लागू नहीं होता जिनकी लोकसंख्या ६० लाख से कम है।

२) प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रो मे ऐसी रीति से विभाजित किया जायेगा की प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्रो को जनसंख्या का उसको आवंटित स्थानो की सांख्या से अनुपात समस्त राज्य मे यथा साध्य एक ही हो।

                                        संक्षेप मे ,संविधान सुनिचित करता है की। (क) राज्यो के बीच (ख) उस राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रो के बीच, प्रतिनिधित्व मे एकरुपता हो।

प्रत्येक जनगणना के पश्यत पुन: समायोजना -

                     हर एक जनगणना की समाप्ति होने पर पुन:समायोजना किया जाता है-
                     (अ) राज्यो को लोकसभा मे स्थानो का आबंटन और (ब) प्रत्येक राज्य का प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रो मे विभाजन। संसद को यह अधिकार है की वह इसके लिये प्राधिकार और रीति का निर्धारण कर। इसी के तहत संसद ने १९५२,१९६२,१९७२ व २००२ मे परिसीमन आयोग अधिनियम लागू किए।
                     ४२वे संशोधन संविधान अधिनियम १९७६ मे राज्यो को लोकसभा मे स्थानो का आवंटन और प्रत्येक राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रो मे विभाजन को वर्ष २००० तक स्थिर कर दिया गया (१९७१ की जनगणना के आधार पर) इस प्रतिबंध को ८४ वे संशोधन अधिनियम २००१ मे अगले २५ वर्षो (यानी वर्ष २०२६ तक) के लिये बढ़ा दिया गया।
                     ८४वे संविधान संशोधन अधिनियम,२००१ मे सरकार को यह शक्ति दी गई की वह १९९१ की जनगना की जनसंख्या के आधार पर राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रो का पुन: समायोजन एव सयुक्तिकरण करती है। बाद मे ८७वे संशोधन संविधान अधिनियम २००३ मे निर्वाचन क्षेत्र का परिसीमन २००१ की जनगणना के आधार पर। हालांकि इस तरह के बदलाव राज्यो को लोकसभा मे स्थानो के आवंटन की सांख्या को बिना बदले किए जाते है।

अनुसूचित जाती व जनजातियो के लिए सीटो का आरक्षण-

                     हालांकि संविधान मे किसी धर्म विशेष की प्रतिनिधि पद्धति का त्याग किया है,लेकिन जनसंख्या के अनुपात के आधार पर अनुसूचित जातियो व जनजातियो के लिए लोकसभा मे सीटे आरक्षित की गयी है। प्रारंभ मे यह आरक्षण १० वर्षो के लिए किया गया था (१९६० तक). इसके बाद इसे हर १० वर्ष बाद १० वर्ष तक के लिए बढ़ा दिया गया। ७९वे संशोधन संविधान अधिनियम ,१९९९, मे इस आरक्षण को २०१० तक के लिए बढ़ा दिया गया।
                     अनुसूचित जातियो व जनजातियो के लिए सीटे आरक्षित की गयी है लेकिन उनका निर्वाचन,निर्वाचन क्षेत्र के सभी मतदाताओ द्वारा किया जाता है। अनुसूचित जाती व जनजाति के सद्स्यो को सामान्य निर्वाचन क्षेत्र से भी चुनाव लड़ने का अधिकार है।
                     ८४वे संशोधन अधिनियम,२००१ मे आरक्षित सीटो को १९९१ की जनगणना के आधार पर पुन: नीयत किया गया (सामन्य सीटो की तरह) ८७वे संशोधन अधिनियम २००३ मे आरक्षित सीटो को १९९१ की बजाए २००१ की जनगणना के आआधार पर पुन:नीयत किया गया।


आनुपातिक प्रतिनिधित्व न अपनाना-
                      हालांकि,संविधान मे राज्यसभा के लिए अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाई गई लेकिन इस प्रणाली को लोकसभा मे नहीं अपनाया गया। इसकी जगह,प्रादेशिक प्रतिनिधितव प्रणाली के जरिए लोकसभा के सद्स्यो को निर्वाचित करने का आधार बनाया गया।
                       प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अंतर्गत, विधानमंडल का प्रत्येक सदस्य एक भूभागीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे निर्वचन क्षेत्र कहा जाता है।
प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि निर्वाचित होता है। अट: एसे निर्वाचन क्षेत्र को एकल सदस्य निर्वाचन क्षेत्र कहा जाता है। इस पद्धति के तहत, जिस प्रत्याशी को अधिक मत प्राप्त होते है, उसे विजयी घोषित किया जाता है। प्रतिनिधित्व पूरी चुनाव प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व नहीं करता। दूसरे श्ब्दो मे, यह अल्पसंख्यांको (छोटे समूहो) के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित नहीं करता।
                       आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का उद्देश् क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व विभेद को हटाना है। इस व्यवस्था के तहत लोगो के सभी वर्गो को अपनी सांख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलता है। यहा तक की सबसे छोटी जनसंख्या वाले वर्ग को भी विधानमंडल से इसका हिस्सा मिलता है।
                       आनुपातिक प्रतिनिधित्व के दो प्रका है, जिसके नाम है- एकल हस्तांतरण मत व्यवस्था एव सूची व्यवस्था। भारत मे राज्यसभा , राज्य विधान परिषदो, राष्ट्रपति एव उपराष्‍ट्रपति के निर्वाचन के लिये पहिले प्रकार की व्यवस्था को अपनाया गया।
                        यद्यपि संविधान सभा के कुछ सद्स्यो ने लोकसभा सद्स्यो के चुनाव के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की वकालत की थी लेकिन इसे संविधान मे दो कारणो से नहीं अपनाया गया-

१। मतदाताओ के लिए मतदान प्रक्रिया (जो की जटिल है) समझने मे कठिनाई , क्योकि देश मे शैषनिक स्टार काम है।
२। बाहुदलीय व्यवस्था के कारण संसद की अस्थिरता।

इसके अलावा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के निम्नलिखित दोष है-
१) यह काफी खर्चीली व्यवस्था है।
२) यह उपचुनाव का कोई अवसर प्रदान नहीं करती।
३) यह मतदाताओ एव प्रतिनिधीयो के बीच आत्मीयता को काम करती है।
४) यह अल्पसंख्यांक एव सामूहिक हिटो को बढ़ावा देती है।
५) यह पार्टी व्यवस्था के महत्व को बढ़ावा देती है एव मतदाताओ के महतव को काम करती है।

Part 1- Part 2 - Part 3 - Part 4-



संसद...Parliament भाग ३

संसद...Parliament -  

भाग ३

Part 1 - Part 2 - Part 3 -Part 4 -

दोनो सदनो की अवधि :
                

राज्यसभा की अवधि -

                   राज्यसभा (पहली बार १९५२ मे स्थापित) निरंतर चलने वाली संस्था है। यानी, यह एक स्थायी संस्था है और इसका विघटन नहीं होता किन्तु इसके एक-तिहा सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत होते है। ये सीटे चुनाव के द्वारा फिर भरी जाती है और राष्ट्रपति द्वारा har तीसरे वर्ष के शुरुवात मे मनोचयन होता है। सेवा निवृत होने वेल सदस्य कितनी बार भी चुनाव लड़ सकते है और नामित हो सकते है।
                    संविधान ने राज्यसभा के सद्स्यो के लिए पदावधि निर्धारित नहीं की थी, इसे संसद पर छोड़ दिया गया था। इसी के तहत जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (१९५१) के आधार पर संसद ने कहा की, राज्यसभा के सद्स्यो की पदावधि छह साल की होनी चाहिए। इस अधिनियम ने भारत के राष्ट्रपति को पहली राज्यसभा मे चुने गए सद्स्यो की पदावधि काम करने का अधिकार दिया। पहले बैच मे यह तय हुआ की लॉटरी के आधार पर सद्स्यो को सेवानिवृत किया जाए। इसके अलावा ,इस अधिनियम द्वारा राष्ट्रपति को राज्यसभा के सद्स्यो की सेवानिवृत्ति के आदेश को शासित करने वाले उपबंध बनाने का अधिकार भी दिया गया।

लोकसभा की अवधि -

                  राज्यसभा से अलग, लोकसभा जारी रहने वाली संस्था नहीं है। सामान्य तौर पर इसकी अवधि आम चुनाव के बाद हुई पहली बैठक से पांच वर्ष के लिए होती है, इसके बाद यह खुद विघटित हो जाती है। हालांकि राष्ट्रपति को पांच स्सल से पेहले किसी भी समय विघटित करने का अधिकार है। इसके खिलाफ न्यायालय मे चुनोती नहीं दी जा सकती।
                   इसके अलावा लोकसभा की अवधि आपात की स्थिति मे एक बार मे एक वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। लेकिन इसका विस्तार किसी भी दशा मे आपातकाल खत्म होने बाद छह महीने की अवधि से अधिक नहीं हो सकता।


Part 1 - Part 2 - Part 3 - Part 4 -



संसद...Parliament..भाग ४

संसद...Parliament..

भाग ४



Part 1- Part 2- Part 3- Part 4 -


संसद की सदस्यता-


अहर्ताए-

संविधान ने संसद मे चुने जाने के लिए निम्नलिखित अहर्ता निर्धारित की है-
१) उसे भारत का नागरिक होना चाहिए।
२)उसे निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची मे दिए प्रारुप के अनुसार शपत या प्रतिज्ञान लेना चाहिये।
३) उसे राज्यसभा मे स्थान के लिए काम से काम ३० वर्ष की आयु का और लोकसभा मे स्थान के लिए काम से काम २५ वर्ष की आयु का होना चाहिये।
४) उसके पास ऐसी अन्य अहरताए होनी चाहिए, जो संसद द्वारा मांगी गई हो।

जन प्रतिनिधितव अधिनियम (१९५१) मे संसद ने निम्नलिखित अन्य अहर्ताए निर्धारित की है।
१) उस व्यक्ति को, राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के उस निर्वाचन क्षेत्र का पंजीकृत मतदाता होना चाहिये। यह लोकसभा एव राज्यसभा दोनो के निर्वाचन के लिए अनिवार्य है। वर्ष २००३ मे सरकार राज्यसभा के निर्वाचन के लिये यह बाध्यता समाप्त कर दी। बाद मे वर्ष २००६ मे उच्छ्तम न्यायालय ने भी सरकार के इस निर्णय हो वैध ठहराया।

२) यदि कोई व्यक्ति आरक्षित सीट पर चुनाव लढना चछ्ता है तो उसे किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्रो मे अनुसूचित जाती या जनजाति का सदस्य होना चाहिए। हालांकि अनुसूचित जाती या जनजाति के सदस्य उन सीटो के लिए चुनाव लड़ सकते है, जो उनके लिए आरक्षित नहीं है।

निरह्रताए -

संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति संसद सदस्य नहीं बन सकता-

१) यदि वह भारत सरकार का किसी राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ या पद धारण करता है। (संसद द्वारा तय कोई पद या मंत्री पद को छोड़कर)
२) यदि वह विकृति चित्त है और न्यायालय ने ऐसी घोषणा की है।
३) यदि वह अनुनमोचित दिवालिया है।
४) यदि वह भारत का नागरिक नहीं है या उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेछा से अर्जित कर ली है या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्टा को अभिस्वीकार किए हुए है।
५) यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा निरहिर्त कर दिया जाता है।

संसद ने जन प्रतिनिधितव अधिनियम (१९५१) मे निम्नलिखित अन्य निरहर्ताए निर्धारित की है-
१) वह चुनावी अपराध या चुनाव मे भ्रष्ट आचरण के तहत दोषी करार न दिया गया हो।
२) उसे किसी अपराध मे दो वर्ष या उससे अधिक की सजा न हुई हो। परंतु प्रतिबन्धात्मक निषेध विधि के अंतर्गत किसी व्यक्ति का बंदीकरण निर्हेता नहीं है।
३) वह निर्धारित समय के अंदर चुनावी खर्च का ब्यूआरा देने मे असफल न रहा हो।
४) उसे सरकारी ठेका, काम या सेवाओ मे कोई दिलचस्पी न हो।
५) वह निगम मे लाभ के पद निदेशक या प्रबंध निदेशक के पद पर न हो, जिसमे सरकार का २५ प्रतिशत हिस्सा हो।
६) उसे भ्रष्टाचार या निष्ठहीन होने के कारण सरकारी सेवाओ से बर्खास्त न किया गया हो।
७) उसे विभिन्न समूहो मे शत्रुता बढ़ाने या रिश्वत खोरी के लिए दंडित न किया गया हो।
८) उसे इनमे छुआछूत ,दहेज व सती जैसे सामाजिक का प्रसार और संलिप्त न पाया गया हो।

किसी सदस्य मे उपरोक्त निर्हारताए सम्बंधी प्रश्न प्र राष्ट्रपति का फैसला अंतिम होगा यद्यपि,राष्ट्रपति को निर्वाचन आयोग से राय लेकर उसी के तहत कार्य करना चाहिए।

दल-बदल के आधार पर निर्हारताए-

संविधान के अनुसार किसी व्यक्ति को संसद की सदस्यता के निर्हर तराया जा सकता है, अगर उसे दसवी अनुसूची के उपबंधो के दल बदल विधि के निम्नलिखित उपबंधो के तहत निर्हर करार दिया जा सकता है-

१) अगर वह स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल को त्याग करता है,जिस दल के टिकट पर उसे चुना गया हो।
२) अगर वह अपने राजनीतिक दल द्वारा दिए निर्देशो के विरुध सदन मे मतदान करता है या नहीं करता है।
३) अगर निर्दलीय चुना गया सदस्य किसी राजनीतिक दल मे शामिल हो जाता है।
४) अगर कोई नामित या नाम निर्देशित सदस्य छह महीने के बाद किसी राजनीतिक दल मे शामिल होता है।

दसवी अनुसूची के तहत निःरता के सवालो का निपटारा राज्यसभा मे सभापति व लोकसभा मे अद्यक्ष करता है ( न की भारत का राष्ट्रपति) १९९२ मे उच्छ्तम न्यायालय ने निर्णय दिया की सभापति/अद्यक्ष के निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

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